16 मई।
भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां बाहरी आर्थिक दबाव लगातार बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। पश्चिम एशिया में युद्ध, होर्मुज जलडमरूमध्य में अस्थिरता, बढ़ती कच्चे तेल की कीमतें और विदेशी पूंजी के तेजी से बाहर जाने की प्रवृत्ति ने भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोरियों को फिर उजागर कर दिया है। रुपये में लगातार गिरावट और आयात लागत में बढ़ोतरी केवल मुद्रा बाजार की समस्या नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर आम लोगों की जिंदगी, महंगाई और रोजगार पर भी पड़ रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल में पेट्रोल और सोने की खपत कम करने की अपील इस बात का संकेत है कि सरकार भी बाहरी आर्थिक दबावों को लेकर चिंतित है। पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी ने पहले ही घरेलू बजट को प्रभावित किया है। रसोई गैस के दाम बढ़ने से निम्न और मध्यम वर्ग की परेशानी बढ़ी है, जबकि परिवहन लागत में वृद्धि का असर खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की वस्तुओं पर दिखाई देने लगा है।
असल चिंता विदेशी पूंजी के तेजी से बाहर जाने को लेकर है। वैश्विक निवेशक हमेशा उन बाजारों की ओर आकर्षित होते हैं, जहां उन्हें अधिक लाभ और अपेक्षाकृत स्थिर माहौल मिले। भारत जैसे उभरते देशों में निवेश पर रिटर्न अधिक होता है, लेकिन इसके साथ मुद्रा अवमूल्यन और महंगाई का जोखिम भी जुड़ा रहता है। जब वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता बढ़ती है, तो निवेशक सुरक्षित बाजारों की ओर लौटने लगते हैं। यही वजह है कि पश्चिम एशिया संकट के बाद भारत समेत कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं से पूंजी बाहर जाने लगी है।
रुपये पर दबाव इसलिए भी बढ़ा है क्योंकि भारत का आयात बिल लगातार बढ़ रहा है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। कच्चे तेल की कीमतों में उछाल का मतलब है कि अधिक डॉलर खर्च होंगे। इससे चालू खाता घाटा बढ़ता है और विदेशी मुद्रा की मांग तेज होती है। जब डॉलर की मांग बढ़ती है और विदेशी निवेश घटता है, तो रुपया कमजोर पड़ने लगता है।
स्थिति की गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है कि अभी अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों के केंद्रीय बैंकों ने ब्याज दरों में कोई नई वृद्धि नहीं की है, फिर भी भारतीय बाजारों से पूंजी बाहर जा रही है। इसका मतलब यह है कि निवेशक भविष्य में संभावित ब्याज दर वृद्धि की आशंका को पहले ही ध्यान में रखकर अपने निवेश निर्णय ले रहे हैं। यदि आने वाले समय में अमेरिकी फेडरल रिजर्व या बैंक ऑफ इंग्लैंड वास्तव में ब्याज दरें बढ़ाते हैं, तो भारत पर दबाव और अधिक बढ़ सकता है।
दुनिया पहले भी ऐसा दौर देख चुकी है। वर्ष 2013 में अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा मौद्रिक प्रोत्साहन कम करने के संकेत मात्र से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में भारी पूंजी निकासी शुरू हो गई थी। इसे “टेपर टैंट्रम” कहा गया। उस समय भारत का रुपया भी तेजी से कमजोर हुआ था। वर्तमान परिस्थितियां उसी तरह की आशंकाओं को जन्म दे रही हैं, फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा संकट ने स्थिति को और जटिल बना दिया है।
भारतीय रिजर्व बैंक और सरकार ने कुछ कदम जरूर उठाए हैं। विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप, कुछ डेरिवेटिव सौदों पर नियंत्रण और सोने के आयात पर शुल्क बढ़ाने जैसे उपाय किए गए हैं। लेकिन ये कदम केवल तात्कालिक राहत दे सकते हैं। मूल समस्या भारत की बाहरी निर्भरता और पूंजी प्रवाह पर अत्यधिक भरोसे की है।
सबसे बड़ा खतरा यह है कि यदि विदेशी ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो भारत को भी अपनी मुद्रा बचाने के लिए ब्याज दरें बढ़ानी पड़ सकती हैं। इसका असर घरेलू निवेश, उद्योग और रोजगार पर पड़ेगा। महंगे कर्ज से आर्थिक गतिविधियां धीमी हो सकती हैं और विकास दर प्रभावित हो सकती है। यानी अर्थव्यवस्था एक कठिन संतुलन की स्थिति में पहुंच सकती है, जहां महंगाई नियंत्रित करने और विकास बनाए रखने के बीच संघर्ष बढ़ जाएगा।
यह समय केवल अल्पकालिक उपायों का नहीं, बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति पर गंभीरता से काम करने का है। ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करना, विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत बनाना, निर्यात बढ़ाना और स्थिर घरेलू निवेश को प्रोत्साहित करना अब केवल आर्थिक विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुके हैं। भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए बाहरी झटकों से पूरी तरह बचना संभव नहीं है, लेकिन मजबूत आर्थिक आधार उन्हें झेलने की क्षमता जरूर दे सकता है।
फिलहाल संकेत यही हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव अभी समाप्त नहीं हुआ है। वैश्विक अनिश्चितता और पूंजी पलायन के इस दौर में आने वाले महीने भारत की आर्थिक स्थिरता की वास्तविक परीक्षा साबित हो सकते हैं।