प्रेरक कहानियाँ
25 Apr, 2026

भगवान की चिट्ठी

असली अमीरी पैसे से नहीं, बल्कि अच्छे कर्मों से होती है। जीवन में जब हम सच्चे दिल से किसी की मदद करते हैं, तो वही असली धन है।

एक छोटे से घर में मां और बेटी रहती थीं। एक रात, दरवाजे पर खटखटाने की आवाज आई। मां और बेटी दोनों गरीब थीं और बहुत छोटे से घर में रहती थीं। बेटी ने दरवाजा खोला, लेकिन वहां कोई नहीं था। नीचे देखा, तो एक चिट्ठी पड़ी हुई थी।

बेटी ने चिट्ठी खोली और पढ़ते ही उसके हाथ कांपने लगे। वह जोर से चिल्लाई—"मां, इधर आओ!" चिट्ठी में लिखा था—"बेटी, मैं तुम्हारे घर आऊंगा, तुमसे और तुम्हारी मां से मिलने।" और नीचे भगवान का नाम लिखा था।

मां ने कहा, "यह शायद हमारी गली के किसी लड़के की शरारत होगी।" लेकिन बेटी को यकीन नहीं हुआ। वह बोली, "मां, मुझे यह सच लग रहा है।" मां को समझाने के बाद दोनों ने तैयारी शुरू कर दी। घर छोटा था, लेकिन दिल बहुत बड़ा था।

घर में एक चटाई थी, जिसे मेहमान के लिए बिछा दिया गया। रसोई में देखा तो खाने के लिए कुछ भी नहीं था। दोनों परेशान हो गईं—अगर भगवान सच में आए, तो उन्हें क्या खिलाएंगी?

बेटी के पास बचत के 300 रुपये थे। वह पैसे लेकर बाजार गई और दूध, मिठाई आदि लगभग 200 रुपये की चीजें खरीद लाई। बाकी पैसे बचाकर जल्दी घर लौटने लगी, क्योंकि उन्हें लगा कि शायद भगवान सच में आ गए होंगे।

घर से थोड़ी दूर जाते ही तेज बारिश शुरू हो गई। सड़क किनारे एक पति-पत्नी खड़े थे, उनके पास एक छोटा बच्चा था, जो बुखार में तप रहा था। उनके पास खाने के लिए कुछ भी नहीं था।

अब बेटी के सामने दो विकल्प थे—भगवान का इंतजार करना, या उन जरूरतमंदों की मदद करना। उसने सोचा कि भगवान को मना लाऊंगी, लेकिन अगर इन्हें छोड़ दिया, तो भगवान कभी माफ नहीं करेंगे।

बेटी ने अपना सारा सामान—दूध, मिठाई—उन्हें दे दिया। साथ ही बचे हुए पैसे भी दे दिए, बारिश से बचने के लिए अपना छाता दे दिया और बच्चे को ठंड से बचाने के लिए कंबल भी दे दिया।

फिर वह जल्दी से घर लौट आई। घर पहुंचते ही मां ने कहा, "तुम इतनी देर क्यों लगीं? और देखो, एक और चिट्ठी आई है।"

बेटी ने चिट्ठी खोली। उसमें लिखा था—"बेटी, आज तुमसे मिलकर बहुत खुशी हुई। पहले से दुबली हो गई हो, लेकिन आज भी उतनी ही सुंदर हो। मिठाई बहुत स्वादिष्ट थी और तुम्हारे दिए हुए कंबल से बहुत आराम मिला। छाता देने के लिए धन्यवाद। अगली बार मिलते ही लौटा दूंगा।

इधर-उधर मत ढूंढो मुझे, मैं तो कण-कण में हूं। जहां पवित्र सोच हो, मैं हर उस मन में हूं। यदि दिखे कोई जरूरतमंद, तो समझना मैं उसी में हूं।"

यह पढ़कर बेटी के होश उड़ गए। उसने बाहर देखा, लेकिन वहां कोई नहीं था। वह रो पड़ी और मां को सब बता दिया। दोनों बहुत भावुक हो गईं और पूरी रात सो नहीं पाईं।

दोस्तों, अब आपसे एक सवाल है—क्या यह बेटी सच में गरीब थी? सोचिए और दिल से जवाब दीजिए। क्योंकि इंसान अपने साथ धन नहीं, बल्कि अच्छे कर्म लेकर जाता है। जरूरी नहीं कि हर अमीर व्यक्ति अच्छे कर्म लेकर जाए। इसलिए कोशिश करें—चाहे पैसों से अमीर हों या गरीब, लेकिन कर्मों से जरूर अमीर बनें।

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