19 मई।
भोपाल की सड़कों पर रोजाना 25 लाख से अधिक लोग सफर करते हैं। शहर की आबादी 40 लाख के पार पहुंच चुकी है, लेकिन सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था अब भी वर्षों पुरानी सोच पर चल रही है। जरूरत जहां 700 से 1000 बसों की बताई जाती है, वहीं सड़कों पर महज 40 से 50 बसें ही दिखाई देती हैं। यह केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि शहरी परिवहन नीति की गंभीर विफलता को दर्शाता है।
जब सरकारी बस सेवा कमजोर होती है तो लोग स्वाभाविक रूप से निजी वाहनों, ऑटो और बाइक टैक्सी पर निर्भर हो जाते हैं। एक बस जहां 50 से 60 यात्रियों को एक साथ ले जा सकती है, वहीं उतने लोगों के लिए दर्जनों दोपहिया और कई कारें सड़क पर उतरती हैं। नतीजा साफ है—चौराहों पर बढ़ता जाम, ईंधन की बर्बादी और लगातार बढ़ता प्रदूषण।
स्थिति को और गंभीर बनाती है बसों की अनियमितता। कई रूट्स पर 30 से 40 मिनट के अंतराल से बसें चल रही हैं। ऐसे में नौकरीपेशा लोग, छात्र और महिलाएं समय बचाने के लिए निजी साधनों का सहारा लेने को मजबूर हैं। इलेक्ट्रिक बसों और नई परिवहन योजनाओं की घोषणाएं जरूर हुईं, लेकिन उनका असर जमीन पर दिखाई नहीं देता।
समाधान स्पष्ट है। यदि सरकार लोक परिवहन को मजबूत करे तो निजी वाहनों पर निर्भरता स्वतः कम हो सकती है। इसके लिए बसों की संख्या बढ़ाने के साथ रूट प्लानिंग, समय की पाबंदी और सुरक्षित सेवा सुनिश्चित करनी होगी। केवल जुर्माने और ट्रैफिक नियमों से समस्या हल नहीं होगी। लोगों को भरोसेमंद विकल्प देना होगा।
ट्रैफिक संकट का स्थायी समाधान नए फ्लाईओवर नहीं, बल्कि मजबूत और सुलभ बस सेवा है। जब तक लोक परिवहन को प्राथमिकता नहीं मिलेगी, तब तक ट्रैफिक मुक्त शहर का सपना अधूरा ही रहेगा।