कांग्रेस और डीएमके के बीच बढ़ती राजनीतिक दूरी गठबंधन में असहजता नेतृत्व मतभेद और राष्ट्रीय परिस्थितियों के बदलाव का परिणाम है जो तमिलनाडु की राजनीति को प्रभावित कर रहा है।
09 मई।
भारतीय राजनीति में गठबंधन केवल चुनावी गणित का विषय नहीं होते, वे समय, परिस्थितियों और हितों के अनुसार बदलते रिश्तों की कहानी भी कहते हैं। दक्षिण भारत की राजनीति में कांग्रेस और डीएमके का संबंध इसी प्रकार का एक लंबा राजनीतिक अध्याय रहा है, जिसने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। कभी दोनों दल एक-दूसरे के सबसे भरोसेमंद सहयोगी माने जाते थे, लेकिन अब इनके बीच दूरी और असहजता के संकेत खुलकर दिखाई देने लगे हैं। यह बदलाव केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि नेतृत्व, क्षेत्रीय आकांक्षाओं और बदलते राष्ट्रीय समीकरणों का परिणाम भी है।
तमिलनाडु की राजनीति हमेशा से क्षेत्रीय अस्मिता और भाषाई पहचान के इर्द-गिर्द घूमती रही है। डीएमके ने स्वयं को लंबे समय तक तमिल हितों की सबसे बड़ी राजनीतिक आवाज के रूप में स्थापित किया। कांग्रेस ने भी समय-समय पर इस राजनीतिक वास्तविकता को स्वीकार करते हुए डीएमके के साथ सहयोग का रास्ता चुना। केंद्र की राजनीति में स्थिरता और तमिलनाडु में चुनावी लाभ दोनों दलों को एक-दूसरे के करीब लाते रहे। लेकिन राजनीति में स्थायी मित्रता जितनी दुर्लभ होती है, उतनी ही स्थायी दूरी भी नहीं होती। यही कारण है कि दोनों दलों के बीच अब जो तनाव दिखाई दे रहा है, उसके पीछे कई परतें हैं।
कांग्रेस आज राष्ट्रीय स्तर पर अपनी राजनीतिक जमीन को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रही है। वह उन राज्यों में भी अपनी स्वतंत्र पहचान मजबूत करना चाहती है जहां लंबे समय से क्षेत्रीय दल उसके राजनीतिक विस्तार की सीमा तय करते रहे हैं। तमिलनाडु भी उन्हीं राज्यों में शामिल है। कांग्रेस के भीतर यह भावना लगातार मजबूत हुई है कि यदि वह केवल सहयोगी दल की भूमिका में सीमित रही तो भविष्य में उसका संगठन और कमजोर हो सकता है। दूसरी ओर डीएमके नहीं चाहती कि राज्य में कांग्रेस इतनी मजबूत हो जाए कि वह भविष्य में चुनौती बनने लगे। यही राजनीतिक असहजता दोनों दलों के रिश्तों में दिखाई देने लगी है।
राष्ट्रीय राजनीति का बदलता परिदृश्य भी इस दूरी का एक बड़ा कारण है। विपक्षी दलों की एकजुटता की चर्चाओं के बीच हर क्षेत्रीय दल अपने प्रभाव क्षेत्र को सुरक्षित रखना चाहता है। डीएमके जानती है कि तमिलनाडु में उसका राजनीतिक वर्चस्व ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। ऐसे में कांग्रेस यदि राज्य में स्वतंत्र रूप से विस्तार की कोशिश करती है तो यह डीएमके के लिए चिंता का विषय बनना स्वाभाविक है। वहीं कांग्रेस के लिए भी केवल सहयोगी दलों के भरोसे राष्ट्रीय राजनीति में पुनरुत्थान संभव नहीं दिखता।
इन सबके बीच नेतृत्व की शैली और राजनीतिक प्राथमिकताओं का फर्क भी सामने आता है। नई पीढ़ी के नेताओं की राजनीति पहले की तुलना में अधिक आक्रामक और आत्मकेंद्रित हो गई है। गठबंधन धर्म की पारंपरिक मर्यादाएं अब उतनी प्रभावी नहीं रहीं जितनी कभी हुआ करती थीं। सहयोगी दल अब एक-दूसरे के साथ रहते हुए भी अपनी अलग राजनीतिक जमीन तैयार करने में लगे रहते हैं। यही कारण है कि बयानबाजी, सीटों की मांग, नेतृत्व की भूमिका और राजनीतिक कार्यक्रमों को लेकर अक्सर तनाव दिखाई देता है।
यह भी सच है कि भारतीय राजनीति में विचारधारा से अधिक महत्व परिस्थितियों का होता है। जिन दलों के बीच आज दूरी दिखाई देती है, वे कल फिर साथ आ सकते हैं। कांग्रेस और डीएमके के संबंधों का इतिहास भी यही बताता है। दोनों दलों ने कई बार मतभेदों के बावजूद राजनीतिक समझौते किए हैं। इसलिए वर्तमान तनाव को अंतिम राजनीतिक निष्कर्ष मानना जल्दबाजी होगी। चुनावी परिस्थितियां और राष्ट्रीय राजनीतिक जरूरतें भविष्य में दोनों को फिर करीब ला सकती हैं।
यह घटनाक्रम भारतीय लोकतंत्र में एक बड़े बदलाव की ओर संकेत करता है। क्षेत्रीय दल अब केवल राष्ट्रीय दलों के सहयोगी बनकर नहीं रहना चाहते, जबकि राष्ट्रीय दल भी अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इस टकराव का असर आने वाले समय में देश की गठबंधन राजनीति पर साफ दिखाई देगा। तमिलनाडु में कांग्रेस और डीएमके के बीच बढ़ती दूरी केवल दो दलों की कहानी नहीं, बल्कि उस बदलती राजनीति का संकेत है जहां सहयोग और प्रतिस्पर्धा साथ-साथ चल रहे हैं।