न्यायपालिका
19 May, 2026

दिल्ली आबकारी अवमानना मामले में केजरीवाल समेत छह आरोपितों को नोटिस जारी, हाईकोर्ट ने दिया जवाब का निर्देश

दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली आबकारी घोटाले से जुड़े अवमानना मामले में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सहित छह आरोपितों को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया और मामले की अगली सुनवाई 4 अगस्त तय की।

नई दिल्ली, 19 मई।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली आबकारी घोटाले से जुड़े मामले में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सहित छह आरोपितों के विरुद्ध शुरू की गई अवमानना कार्यवाही पर सुनवाई करते हुए सभी को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति नवीन चावला की अध्यक्षता वाली पीठ ने आरोपितों को चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है तथा अगली सुनवाई की तारीख 4 अगस्त तय की गई है।

उच्च न्यायालय ने रजिस्ट्री को यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं कि अवमानना से संबंधित सामग्री को सुरक्षित रूप से संरक्षित रखा जाए। इससे पूर्व न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा की पीठ ने 14 मई को अरविंद केजरीवाल सहित छह आरोपितों के खिलाफ न्यायालय की अवमानना का नोटिस जारी किया था।

इन आरोपितों में संजय सिंह, मनीष सिसोदिया, सौरभ भारद्वाज, विनय मिश्रा और दुर्गेश पाठक भी शामिल हैं। बाद में न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा की पीठ ने स्वयं को इस मामले की सुनवाई से अलग करते हुए इसे अन्य पीठ को स्थानांतरित कर दिया था।

न्यायालय ने टिप्पणी की थी कि यदि इन आरोपितों पर कार्रवाई नहीं की गई तो व्यवस्था में अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। अदालत ने यह भी कहा था कि जब किसी संस्था को परीक्षण के दायरे में लाया जाता है तो न्यायाधीश का दायित्व होता है कि वह इन आरोपों से प्रभावित न हो।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया था कि उसे इस बात की जानकारी मिली कि पत्रों और वीडियो के माध्यम से सोशल मीडिया पर एक संगठित अभियान चलाया गया, जो व्यापक रूप से प्रसारित हुआ और एक सुनियोजित रणनीति के तहत संचालित प्रतीत होता है।

न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा था कि न्यायालय की कार्यवाही को बाहर एक समानांतर कथा के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिससे न्यायिक प्रक्रिया पर प्रभाव डालने का प्रयास हुआ। उन्होंने यह भी कहा था कि सोशल मीडिया के माध्यम से न केवल एक न्यायाधीश के विरुद्ध माहौल बनाया गया, बल्कि पूरी न्यायपालिका को भी कठघरे में खड़ा किया गया।

अदालत ने यह टिप्पणी भी की थी कि कुछ लोगों को राजनीतिक प्रभाव भी प्राप्त है और संपादित वीडियो प्रसारित किए गए। उन्होंने कहा था कि न्यायालय के भीतर की गई कार्यवाही के बावजूद बाहर उनके विरुद्ध अभियान चलाया गया, जबकि संबंधित पक्षों के पास उच्चतम न्यायालय में जाने का विकल्प मौजूद था।

इसके अतिरिक्त, न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा ने 20 अप्रैल को इसी मामले से जुड़ी एक याचिका पर स्वयं को सुनवाई से अलग करने की मांग को भी अस्वीकार कर दिया था और कहा था कि वह बिना किसी प्रभाव के अपना निर्णय सुनाएंगी।

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