मणिपुर, 04 नवंबर।
मणिपुर एक बार फिर हिंसा की आग में झुलस रहा है। इंफाल में मैतई संगठनों की रैली और नोने जिले में सशस्त्र झड़प ने साबित कर दिया है कि 2023 में शुरू हुआ घाव अब तक नहीं भरा है। तीन मैतई युवकों की हत्या के बाद घाटी में आक्रोश और पहाड़ों में अविश्वास बढ़ा है। करीब चार घंटे चली गोलीबारी में तीन लोगों की मौत बताती है कि बफर जोन के भरोसे शांति कायम नहीं रह सकती। स्थायी समाधान के लिए केंद्र और राज्य सरकार को मिलकर प्रयास करने होंगे।
मैतई और कुकी समुदायों के बीच संघर्ष की जड़ जमीन, पहचान और असुरक्षा की भावना है। मैतई घाटी में रहते हैं, जो प्रदेश का लगभग दस प्रतिशत हिस्सा है, जबकि कुकी और नगा समुदाय मुख्यतः पहाड़ी क्षेत्रों में रहते हैं। मैतई समुदाय अनुसूचित जनजाति का दर्जा चाहता है, जबकि कुकी समुदाय को आशंका है कि इससे उसकी जमीन और रोजगार के अवसर प्रभावित होंगे। इसी अविश्वास ने 2023 में हिंसा को जन्म दिया। आज भी हजारों लोग राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं और बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
अब नगा संगठनों की सक्रियता से संघर्ष के त्रिकोणीय होने की आशंका बढ़ी है। केंद्र सरकार को तीनों समुदायों के प्रतिनिधियों, महिलाओं, युवाओं और बुद्धिजीवियों की संयुक्त शांति परिषद बनानी चाहिए। नियमित बातचीत और निष्पक्ष मध्यस्थता से ही अविश्वास कम हो सकता है। जमीन और पहचान से जुड़े विवादों पर स्पष्ट कानूनी निर्णय, अवैध हथियारों की बरामदगी और हिंसा में शामिल लोगों के विरुद्ध निष्पक्ष कार्रवाई जरूरी है।
राहत शिविरों में बच्चों की शिक्षा और महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ रोजगार, सड़क, इंटरनेट और कृषि आधारित उद्योगों के माध्यम से विकास को गति देनी होगी। मणिपुर भारत की सांस्कृतिक विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मैतई, कुकी और नगा, तीनों समुदायों का भविष्य इसी धरती से जुड़ा है। आरोप-प्रत्यारोप छोड़कर संवाद का रास्ता अपनाना होगा। स्थायी शांति नफरत से नहीं, विश्वास, न्याय और बातचीत से ही आएगी।














