संपादकीय
13 May, 2026

हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और बदलती राजनीतिक धारा

देश में सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक स्थलों के विकास और बदलती राजनीतिक धारा के बीच राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक दृष्टिकोण में व्यापक परिवर्तन का सिलसिला लगातार आगे बढ़ रहा है।

13 मई।
भारत अपने स्वाभिमान, विरासत और गौरव के प्रति कमिटमेंट पर अब झुकने को तैयार नहीं है। देश सनातन संस्कृति के लुटेरों की बुरी स्मृतियों को याद रखते हुए पुनर्निर्माण की अपनी सृजन क्षमता को दुनिया के सामने दिखाने से भी पीछे नहीं है। सोमनाथ मंदिर को मुगलों ने कई बार नष्ट किया, तो भारतीयों ने उसका हर बार पुनर्निर्माण किया। आजादी के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल ने वर्ष 1951 में सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। उसी की 75वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस दिव्यता और भव्यता के साथ इस उत्सव को मनाया है, भारतीयों ने उसका दिग्दर्शन किया। यह सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना का अवसर तो है ही, लेकिन इसके पीछे देश की उस राजनीतिक चेतना की भी भूमिका है, जिसकी एकजुटता के कारण देश की राजनीतिक धारा बदल सकी है।
सनातन संस्कृति भारत का मूल तत्व है। आक्रांताओं ने इसी पर सबसे ज्यादा हमला किया। हमारे मंदिर तोड़े गए, हमारी आस्था पर चोट की गई, फिर भी हम बार-बार खड़े हुए। राष्ट्रीय स्वाभिमान किसी भी राष्ट्र की पहचान होता है। आजादी के बाद बनी पहली सरकार का प्राथमिक दायित्व मुगलों द्वारा नष्ट किए गए सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण होना चाहिए था, लेकिन सरकार ने यह दायित्व नहीं निभाया। पहले प्रधानमंत्री ने इस बात पर ऐतराज किया कि मंदिर का निर्माण सरकारी खजाने से कराया जाए। इसके बाद सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का बीड़ा उठाया।
इसके लिए आस्थावान हिंदुओं ने आर्थिक योगदान दिया। मंदिर बना, लेकिन पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसकी प्राण-प्रतिष्ठा में भी शामिल होना स्वीकार नहीं किया। उनकी राजनीतिक धारा आज भी देश में मौजूद है। तुष्टीकरण की अवधारणा उसी का प्रतीक मानी जाती है। तब से लेकर अब तक देश की राजनीति में निर्णायक बदलाव आया है। अब देश के प्रधानमंत्री को सनातन संस्कृति की आस्था के प्रतीक तीर्थ स्थलों पर विकास और निर्माण कार्य करने में कोई संकोच नहीं है। त्रिपुंड धारण कर शिव की आराधना करने और उसे टीवी चैनलों के माध्यम से पूरे देश तक पहुंचाने में प्रधानमंत्री गौरव की अनुभूति करते हैं।
सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण हो चुका है। पांच सौ वर्षों के संघर्ष के बाद अयोध्या में भव्य राम मंदिर बन गया है। काशी विश्वनाथ लोक तीर्थ यात्रियों को आध्यात्मिक अनुभव दे रहा है। केदारनाथ लोक और महाकाल लोक के साथ ही सनातन और हिंदू आस्था के देश के लगभग सभी प्रमुख तीर्थ स्थलों पर विकास की नई धारा प्रवाहित हो रही है। अब देश में ऐसी राजनीतिक धारा चल रही है, जिसमें सनातन संस्कृति और आस्था के प्रति विश्वास प्रकट करना भारतीयता पर विश्वास के साथ जुड़ गया है। सनातन संस्कृति राष्ट्रवाद का प्रतीक बनती जा रही है।
देश में 2014 के पहले हिंदुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा की केवल छह राज्यों में सरकारें थीं। अब यह संख्या बीजेपी और उसके गठबंधन के साथ बढ़कर 23 राज्यों तक पहुंच गई है। हिंदुत्व की राजनीति बीजेपी की बुनियादी विचारधारा रही है, लेकिन इसे व्यापक जनमत में स्थापित करने में लंबा समय लगा। पहले क्षेत्र और भाषा के आधार पर हिंदुत्व को अलग-थलग करने की कोशिश होती थी, लेकिन अब इसमें भी बदलाव दिखाई दे रहा है। पश्चिम बंगाल और असम में बीजेपी की प्रचंड जीत ने यह साबित किया है कि सनातन संस्कृति और राष्ट्रीय स्वाभिमान को राष्ट्रवाद के साथ जोड़कर राजनीति की जो नई धारा बनी है, उसका प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।
सोमनाथ मंदिर पुनर्निर्माण की 75वीं वर्षगांठ पर आयोजित उत्सव की भव्यता पर भी नजर डालना जरूरी है। बीजेपी और गठबंधन शासित राज्यों में इस उत्सव को लगभग सरकारी आयोजन का स्वरूप दिया गया। जिस सोमनाथ मंदिर के निर्माण में उस समय के प्रधानमंत्री सरकारी खजाने से धन खर्च करने के पक्ष में नहीं थे, उसी मंदिर के पुनर्निर्माण की वर्षगांठ पर मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में चार दिनों तक सरकारी स्तर पर करोड़ों रुपए के विज्ञापन अभियान चलाए गए।
सनातन संस्कृति और हिंदू आस्था के प्रति राज्य सरकारों में मानो प्रतिस्पर्धा चल रही है। कोई भी सरकार इस मामले में पीछे नहीं दिखना चाहती। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हिंदुत्व के प्रमुख आइकॉन बन चुके हैं। उनकी लोकप्रियता को देखते हुए भाजपा शासित राज्यों के अन्य मुख्यमंत्री भी इस दिशा में कोई कमी नहीं छोड़ना चाहते। लगभग हर मुख्यमंत्री अपने गवर्नेंस का मूल तत्व हिंदुत्व को बनाना चाहता है।
सनातन संस्कृति और गौरव के प्रति भारत तथा राज्य सरकारों की प्रतिबद्धता अब राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ गई है। जिस प्रकार का कमिटमेंट हिंदू आस्था के तीर्थ स्थलों के प्रति दिखाई देता है, वैसा ही राष्ट्र की सुरक्षा के प्रति भी नजर आता है। ऑपरेशन सिंदूर इसका बड़ा उदाहरण है। सोमनाथ मंदिर पुनर्निर्माण की वर्षगांठ पर भारतीय वायुसेना द्वारा प्रस्तुत एयर शो भी भारत की शक्ति और सामर्थ्य का प्रदर्शन माना जा सकता है।
देश में इस समय दो प्रमुख राजनीतिक दर्शन दिखाई देते हैं। हिंदुत्व के दर्शन का वेग इतना तेज हो गया है कि उसके विरोधी राजनीतिक दर्शन को अब किसी नए मॉडल या वैकल्पिक विचारधारा की जरूरत महसूस हो रही है। उत्तर भारत पहले से ही हिंदुत्व की राजनीति में रचा-बसा रहा है। अब बंगाल भी इस धारा की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। असम पहले ही इस मार्ग को अपना चुका है। दक्षिण भारत में भी हिंदुत्व का वैचारिक बीजारोपण हो चुका है। केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना में भविष्य में हिंदुत्व के राजनीतिक दर्शन को लेकर तीखा संघर्ष दिखाई पड़ सकता है।
“सबका साथ, सबका विकास” सरकार का दर्शन है, लेकिन हिंदुत्व का एकीकरण राष्ट्र का दर्शन बनता जा रहा है। गवर्नेंस में हिंदुत्व का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। हिंदुत्व को भारत की जीवन पद्धति माना जाता है, इसलिए सरकार की कार्यपद्धति में भी उसका प्रभाव स्पष्ट दिखाई देने लगा है। 
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