नई दिल्ली, 28 अप्रैल।
पश्चिम एशिया में जारी तनाव को कम करने के लिए ईरान की ओर से नए प्रस्ताव सामने आने के बाद भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में राहत के संकेत नहीं दिख रहे हैं। ब्रेंट क्रूड का भाव आज 110 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया, वहीं वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) क्रूड भी 97 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया। हालांकि कारोबार के दौरान कीमतों में हल्की गिरावट भी दर्ज की गई।
ब्रेंट क्रूड ने दिन की शुरुआत तेजी के साथ लगभग 108 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से की और कुछ ही समय में यह बढ़कर 109.46 डॉलर तक पहुंच गया। इसके बाद इसमें गिरावट आई और भाव 107.98 डॉलर तक फिसल गए। बाद में फिर तेजी लौटने लगी और भारतीय समयानुसार सुबह नौ बजे तक यह 0.90 प्रतिशत की बढ़त के साथ 109.20 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखाई दिया।
डब्ल्यूटीआई क्रूड ने भी शुरुआती कारोबार में मजबूती दिखाई और 96 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर 96.62 डॉलर से शुरुआत की। थोड़ी गिरावट के बाद यह 96.24 डॉलर तक आया, लेकिन जल्द ही इसमें तेजी लौट आई और भाव 97.55 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गए। इसके बाद हल्की गिरावट दर्ज हुई और सुबह नौ बजे यह 0.95 प्रतिशत की तेजी के साथ 97.29 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता रहा।
अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित दूसरे चरण की वार्ता के टलने और होर्मुज स्ट्रेट को लेकर दोनों देशों के बीच बढ़ते टकराव के कारण इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से कच्चे तेल की आपूर्ति लगभग ठप बनी हुई है। ईरान ने वार्ता फिर से शुरू करने के लिए नया प्रस्ताव रखा है और अमेरिका ने उस पर विचार की बात कही है, इसके बावजूद कीमतों में नरमी नहीं आ रही है।
फरवरी के अंत में शुरू हुए पश्चिम एशिया के संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को गहराई से प्रभावित किया है। होर्मुज स्ट्रेट के लगभग बंद हो जाने से फारस की खाड़ी से तेल और गैस की आपूर्ति में भारी कमी आई है। अमेरिका ने दबाव बनाने के लिए नाकेबंदी की है, वहीं ईरान भी इस मार्ग को अंतरराष्ट्रीय आवाजाही के लिए सीमित करने की कोशिश कर रहा है।
दुनिया की कुल तेल और गैस आपूर्ति का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। इसके प्रभावित होने से वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ी है और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखा गया है। विशेष रूप से डब्ल्यूटीआई क्रूड के दाम में लगभग 70 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है।
हालांकि दोनों देशों के बीच युद्धविराम की स्थिति बनी हुई है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि तेल से जुड़ी संरचनाओं को पूरी तरह से सामान्य होने में समय लगेगा। बंद पड़े तेल कुओं को दोबारा चालू करना, जहाजों और कर्मियों को पुनः व्यवस्थित करना तथा रिफाइनरी भंडार को संतुलित करना एक लंबी प्रक्रिया साबित होगी।
विशेषज्ञों के अनुसार कच्चे तेल की ऊंची कीमतें लंबे समय तक बनी रहीं तो भारत के चालू खाता घाटे पर दबाव बढ़ सकता है। इसके साथ ही राजकोषीय घाटे के लक्ष्य पर भी असर पड़ने की आशंका है। बढ़ती कीमतें रुपये को कमजोर कर सकती हैं, महंगाई को बढ़ा सकती हैं और विदेशी निवेश के बाहर जाने की प्रवृत्ति को तेज कर सकती हैं। ऐसी स्थिति में अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ने से शेयर बाजार में अनिश्चितता भी देखने को मिल सकती है, क्योंकि सरकार को सब्सिडी, ब्याज दर और विनिमय दर से जुड़े कठिन निर्णय लेने पड़ सकते हैं।












