संपादकीय
26 May, 2026

कमबैक’ या कांग्रेस के लिए अस्तित्व की आखिरी लड़ाई

दतिया उपचुनाव को लेकर मध्यप्रदेश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है, जहां भाजपा अपनी 7,742 वोटों की हार का बदला लेने की कोशिश में है, वहीं कांग्रेस सीट बचाने के संघर्ष में जुटी है। यह मुकाबला अब केवल एक सीट का नहीं, बल्कि प्रदेश की राजनीतिक दिशा का संकेत माना जा रहा है।

दतिया, 26 मई।

7,742 वोटों की हार का हिसाब बराबर करने उतरी भाजपा, जबकि कांग्रेस के सामने सीट बचाने की चुनौती है। 25 मई से ईवीएम-वीवीपैट की फर्स्ट लेवल चेकिंग शुरू हो चुकी है और दतिया उपचुनाव का सियासी पारा चढ़ गया है। अब यह सिर्फ एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की राजनीतिक दिशा तय करने वाली लड़ाई बनता दिखाई दे रहा है।

2023 के विधानसभा चुनाव में दतिया ने बड़ा राजनीतिक उलटफेर किया था। तत्कालीन गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा, जिन्हें भाजपा का मजबूत रणनीतिक चेहरा माना जाता था, कांग्रेस के राजेंद्र भारती से मात्र 7,742 वोटों से हार गए थे। यह हार भाजपा के लिए व्यक्तिगत और संगठनात्मक दोनों स्तरों पर बड़ा झटका थी। सत्ता में वापसी के बावजूद यह पराजय पार्टी को लगातार चुभती रही।

अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। राजेंद्र भारती की सदस्यता अदालत से सजा मिलने के बाद समाप्त हो गई है और उपचुनाव तय माना जा रहा है। भाजपा के लिए यह चुनाव नरोत्तम मिश्रा की राजनीतिक वापसी का सबसे बड़ा अवसर बन गया है। पिछले कुछ समय में उनकी सक्रियता तेजी से बढ़ी है। उनकी मौजूदगी में 500 से अधिक कांग्रेस कार्यकर्ता भाजपा में शामिल हो चुके हैं। इनमें कई स्थानीय प्रभाव वाले युवा और क्षत्रिय चेहरे भी शामिल हैं।

जमीनी रिपोर्ट बताती हैं कि कांग्रेस की स्थानीय संगठनात्मक संरचना प्रभावित हुई है। बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं के टूटने की चर्चा है। नरोत्तम मिश्रा अब “वापसी के प्रतीक” के रूप में खुद को स्थापित करने की कोशिश में हैं। समाजों के बीच संपर्क, संगठनात्मक बैठकों और पुराने नेटवर्क को सक्रिय करने का अभियान तेज हो गया है। भाजपा भी जानती है कि मिश्रा जैसा अनुभवी संगठनकर्ता भविष्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

दूसरी ओर कांग्रेस दुविधा में दिखाई दे रही है। सबसे बड़ा सवाल उम्मीदवार को लेकर है। राजेंद्र भारती के परिवार की दावेदारी सामने आ रही है, लेकिन इससे परिवारवाद के आरोपों का खतरा भी बढ़ गया है। 2023 में परिवर्तन के नाम पर वोट पाने वाली कांग्रेस के सामने अब यह चुनौती है कि वह सहानुभूति और संगठन के बीच संतुलन कैसे बनाए।

स्थानीय स्तर पर कई दावेदार टिकट को लेकर सक्रिय हैं। कांग्रेस के भीतर यह भावना भी उभर रही है कि टिकट किसी “पैराशूट उम्मीदवार” के बजाय जमीनी कार्यकर्ता को मिलना चाहिए। दलबदल का बढ़ता दबाव भी पार्टी के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।

दतिया ग्वालियर-चंबल अंचल की राजनीति का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। इसलिए यह उपचुनाव केवल एक सीट का मामला नहीं रह गया है। भाजपा के लिए यह 2023 की हार को “अपवाद” साबित करने की लड़ाई है, जबकि कांग्रेस के लिए यह अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता बचाने का संघर्ष बन चुका है।

आने वाले महीनों में बूथ प्रबंधन, जातीय समीकरण और आखिरी चरण का प्रचार इस चुनाव की दिशा तय करेगा। इतना तय है कि दतिया का परिणाम सिर्फ एक विधायक नहीं चुनेगा, बल्कि यह भी संकेत देगा कि मध्यप्रदेश की अगली राजनीतिक हवा किस दिशा में बह रही है।

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