नई दिल्ली, 27 मई।
सर्वोच्च न्यायालय ने असम सरकार को उन छूटे हुए मस्टर रोल श्रमिकों के नियमितीकरण का रास्ता साफ कर दिया है, जिन्हें पहले के कैबिनेट निर्णय के बावजूद लाभ नहीं मिल पाया था। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने सुकन्दु भट्टाचार्य बनाम स्टेट ऑफ असम मामले में फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार की जवाबदेही तय की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि एक बार जब सरकार ने 1 अप्रैल 1993 से पूर्व नियुक्त श्रमिकों को नियमित करने की नीति लागू कर दी, तो वह उस वर्ग के प्रत्येक पात्र सदस्य को समान लाभ देने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 'स्टेट ऑफ कर्नाटक बनाम उमादेवी' के फैसले को बिना सोचे-समझे लागू कर दशकों से सेवा दे रहे श्रमिकों के दावों को खारिज करना अनुचित है। मस्टर रोल श्रमिकों की नियुक्ति राज्य की नीति का हिस्सा थी और ये कर्मचारी मौसमी नहीं, बल्कि वर्षों से नियमित सरकारी कार्य कर रहे थे। कुछ कर्मचारियों को केवल प्रशासनिक चूक के कारण नियमितीकरण से बाहर रखना अनुच्छेद 14 का सीधा उल्लंघन है, जो राज्य के एक 'आदर्श नियोक्ता' होने के दायित्व पर सवाल खड़ा करता है।
पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि राज्य ने पूर्व में उच्च न्यायालय में शपथपत्र देकर आश्वासन दिया था कि छूटे हुए श्रमिकों के मामलों पर विचार किया जाएगा। 30,000 कर्मचारियों को नियमित करने के बाद बाकी बचे पात्र श्रमिकों के मन में एक 'वैध अपेक्षा' जागृत हुई थी कि नीति का पालन निष्पक्ष रूप से होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने गौहाटी उच्च न्यायालय की खंडपीठ के निर्णय को रद्द करते हुए एकल न्यायाधीश के उस आदेश को बहाल कर दिया है, जो श्रमिकों के पक्ष में था।
अदालत ने निर्देश दिया है कि अपीलकर्ताओं को उसी तिथि से नियमित माना जाए जिस तारीख से उनके समकक्षों को लाभ मिला था। इसके लिए राज्य को आवश्यक होने पर अतिरिक्त पद सृजित करने होंगे। कर्मचारियों को वेतन निर्धारण, सेवा की निरंतरता, पेंशन और सेवानिवृत्ति सहित सभी लाभ दिए जाएंगे। सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पेंशन पुनर्गणना का लाभ मिलेगा और दिवंगत कर्मचारियों के परिवारों को अर्जित लाभ सौंपे जाएंगे। शीर्ष अदालत ने राज्य को यह पूरी प्रक्रिया एक वर्ष के भीतर पूरा करने का सख्त आदेश दिया है।













