नई दिल्ली, 29 मई ।
पिछले एक दशक में भारत की दिवाला एवं ऋण शोधन अक्षमता व्यवस्था में बड़े बदलाव देखने को मिले हैं, जिसमें वर्ष 2016 में लागू किए गए दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) ने एक बिखरी और लंबी प्रक्रिया वाली प्रणाली को बदलकर एकीकृत, समयबद्ध और ऋणदाता-प्रधान ढांचा स्थापित किया है।
पहले भारत में वित्तीय संकट से जूझ रही कंपनियों के मामलों का निपटारा विभिन्न कानूनों और मंचों के तहत होता था, जिनमें कंपनियां अधिनियम, बीआईएफआर, ऋण वसूली न्यायाधिकरण और सरफेसी अधिनियम शामिल थे। अलग-अलग संस्थानों के कारण मामलों में वर्षों लग जाते थे और संपत्तियों का मूल्य घटता जाता था, जिससे बैंकों को भी भारी नुकसान होता था।
आईबीसी के लागू होने के बाद कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया के तहत एकीकृत प्रणाली बनाई गई, जिसमें राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण को निर्णय का अधिकार दिया गया और अपीलीय प्रक्रिया को राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण तक सीमित किया गया। इस ढांचे के तहत नियंत्रण डिफॉल्ट करने वाले प्रमोटरों से हटकर ऋणदाताओं की समिति को सौंपा गया, जिससे निर्णय प्रक्रिया में बड़ा बदलाव आया।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार मार्च 2026 तक 8,987 समाधान प्रक्रियाएं स्वीकार की गईं, जिनमें से 7,102 मामलों का निपटारा हो चुका है। इनमें 1,419 कंपनियों का समाधान योजना के माध्यम से पुनर्गठन हुआ, जबकि 3,003 कंपनियों को परिसमापन में जाना पड़ा। लगभग 58 प्रतिशत मामलों में समाधान, निपटान या वापसी जैसे सकारात्मक परिणाम सामने आए।
आईबीसी के तहत ऋणदाताओं ने अब तक 4.32 लाख करोड़ रुपये से अधिक की वसूली की है, जो विभिन्न वसूली माध्यमों की तुलना में अधिक प्रभावी मानी जा रही है। इससे बैंकिंग प्रणाली में गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों में भी उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है।
भारतीय प्रबंधन संस्थानों के अध्ययनों में पाया गया है कि समाधान के बाद कंपनियों के प्रदर्शन में बिक्री, लाभ और बाजार मूल्य में सुधार हुआ है, जबकि ऋण भुगतान व्यवहार भी बेहतर हुआ है। वहीं आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार बैंकों की सकल एनपीए दर में भी उल्लेखनीय कमी आई है।
हालांकि इस व्यवस्था में समयसीमा से अधिक देरी, कानूनी विवाद और न्यायाधिकरणों पर बढ़ते मामलों का दबाव जैसी चुनौतियां भी बनी रहीं, जिससे कई मामलों में समाधान प्रक्रिया प्रभावित हुई।
इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए सरकार ने वर्ष 2026 में दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता में संशोधन किया, जिसमें प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट, तेज और प्रभावी बनाने के प्रावधान किए गए हैं। संशोधन में प्रमुख शब्दों की स्पष्ट परिभाषा, समयबद्ध निर्णय, परिसमापन में ऋणदाता की बढ़ी भूमिका और परिसंपत्ति पुनर्प्राप्ति प्रक्रिया को मजबूत करने जैसे बदलाव शामिल हैं।
इसके साथ ही अब धोखाधड़ी से जुड़े मामलों की निगरानी, गारंटर परिसंपत्तियों को समाधान प्रक्रिया में शामिल करने और व्यवसायों के पुनर्गठन को आसान बनाने जैसे प्रावधान भी जोड़े गए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन सुधारों से बैंकिंग प्रणाली में वसूली क्षमता बढ़ेगी, निवेशकों का भरोसा मजबूत होगा और दिवाला मामलों के निपटारे में तेजी आएगी, हालांकि इसका वास्तविक प्रभाव न्यायिक और संस्थागत क्षमता पर निर्भर करेगा।











