नई दिल्ली, 04 जून ।
सुप्रीम कोर्ट ने टीईटी विवाद पर जो फैसला दिया है, वह राहत कम और चेतावनी अधिक है। 31 अगस्त 2028 तक का समय देकर अदालत ने मानवीय पक्ष को जरूर देखा है, लेकिन साथ ही स्पष्ट कर दिया है कि इसके बाद बिना टीईटी पास किए कोई शिक्षक कक्षा में नहीं रह सकेगा। यह उन हजारों शिक्षकों के लिए साफ संदेश है जो अब तक अनुभव के आधार पर पात्रता की शर्त से बचते रहे हैं।
2009 से पहले नियुक्त शिक्षकों को हटाने पर लगी रोक को राहत माना जा सकता है, लेकिन इसे स्थायी समाधान नहीं समझना चाहिए। अदालत ने नौकरी बचाने का अवसर तो दिया है, साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया है कि यह रियायत नहीं, सुधार का मौका है। 20-25 वर्षों का अनुभव महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन वह न्यूनतम शैक्षणिक पात्रता का विकल्प नहीं बन सकता।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 का मूल उद्देश्य ही योग्य शिक्षकों की नियुक्ति सुनिश्चित करना था। जब देश में बड़ी संख्या में बच्चे बुनियादी गणित और भाषा कौशल में पिछड़ रहे हों, तब शिक्षक की गुणवत्ता पर समझौता नहीं किया जा सकता। टीईटी केवल एक परीक्षा नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य की न्यूनतम गारंटी है।
31 अगस्त 2028 से पहले होने वाली समीक्षा प्रक्रियाएं भी महत्वपूर्ण होंगी। अदालत यह देखेगी कि कितने शिक्षक पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण कर पाए हैं। इसलिए, यह समय टालमटोल का नहीं, तैयारी का है। राज्य सरकारों को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। वरिष्ठ शिक्षकों के लिए विशेष प्रशिक्षण, निःशुल्क कोचिंग और पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराना आवश्यक है।
सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने ‘अनुभव बनाम योग्यता’ की बहस को लगभग समाप्त कर दिया है। अनुभव का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन शिक्षा व्यवस्था में न्यूनतम योग्यता अनिवार्य है। शिक्षक केवल वरिष्ठ ही नहीं, योग्य भी होना चाहिए।
यह फैसला शिक्षा व्यवस्था के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि गुणवत्ता से समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। 31 अगस्त 2028 के बाद नियम सीधा होगा—टीईटी पास, तो शिक्षक; अन्यथा नहीं। देश के भविष्य को बेहतर बनाने के लिए यह कठोर लेकिन आवश्यक कदम है।





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