नई दिल्ली, 04 जून ।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा देश के सभी उच्च न्यायालयों को यह निर्देश देना कि सुरक्षित रखे गए फैसले सामान्यतः तीन माह के भीतर सुनाए जाएं, भारतीय न्याय व्यवस्था में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह निर्देश केवल प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं है, बल्कि उस गंभीर चिंता का उत्तर भी है जो वर्षों से न्यायिक प्रक्रिया में हो रही देरी को लेकर व्यक्त की जाती रही है। न्याय केवल निष्पक्ष होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका समय पर मिलना भी उतना ही आवश्यक है। यदि किसी व्यक्ति को वर्षों तक अपने मामले के निर्णय का इंतजार करना पड़े, तो न्याय का वास्तविक उद्देश्य ही प्रभावित हो जाता है।
देश की अदालतों में लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। करोड़ों मुकदमे विभिन्न स्तरों की अदालतों में विचाराधीन हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे मामलों की भी है, जिनकी सुनवाई पूरी हो चुकी है और फैसला सुरक्षित रखा जा चुका है। ऐसे मामलों में पक्षकारों को यह भी पता नहीं होता कि उन्हें निर्णय के लिए कितना लंबा इंतजार करना पड़ेगा। यह अनिश्चितता कई बार आर्थिक, सामाजिक और मानसिक स्तर पर गंभीर प्रभाव छोड़ती है। भूमि विवाद, पारिवारिक मामले, सेवा संबंधी याचिकाएं और आपराधिक प्रकरण वर्षों तक लंबित रहने के कारण लोगों का न्याय व्यवस्था पर विश्वास कमजोर पड़ने लगता है।
सबसे अधिक चिंता उन मामलों को लेकर है, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े हैं। देश की जेलों में बड़ी संख्या में ऐसे विचाराधीन (अंडरट्रायल) कैदी हैं, जिनके मामलों का अंतिम निर्णय अभी तक नहीं हो पाया है। कई बार जमानत संबंधी याचिकाएं भी लंबे समय तक लंबित रहती हैं। यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 21 की मूल भावना के विपरीत है, जो प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। यदि कोई व्यक्ति दोष सिद्ध हुए बिना वर्षों तक जेल में रहने को विवश हो जाए, तो यह केवल प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि मानवाधिकारों का भी प्रश्न बन जाता है।
सुप्रीम कोर्ट की नई व्यवस्था का सबसे सकारात्मक पहलू जवाबदेही और पारदर्शिता पर दिया गया जोर है। यदि उच्च न्यायालयों को नियमित रूप से यह बताना होगा कि कितने फैसले सुरक्षित हैं और वे कब से लंबित हैं, तो स्वाभाविक रूप से निर्णय प्रक्रिया में गति आएगी। न्यायपालिका की स्वतंत्रता जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण उसकी उत्तरदायित्वपूर्ण कार्यप्रणाली भी है। जनता का विश्वास तभी मजबूत होगा, जब उसे यह महसूस होगा कि न्यायिक संस्थाएं समयबद्ध और संवेदनशील तरीके से कार्य कर रही हैं।
हालांकि यह भी स्वीकार करना होगा कि न्यायिक देरी का कारण केवल न्यायाधीशों की कार्यशैली नहीं है। न्यायपालिका लंबे समय से संसाधनों की कमी से जूझ रही है। उच्च न्यायालयों और अधीनस्थ अदालतों में बड़ी संख्या में पद रिक्त हैं। बढ़ती आबादी और मुकदमों की संख्या के अनुपात में न्यायिक ढांचा पर्याप्त नहीं है। कई अदालतों में आधारभूत सुविधाओं का अभाव है। डिजिटल तकनीक के विस्तार के बावजूद न्यायिक प्रक्रियाओं में आधुनिक साधनों का उपयोग अभी भी सीमित है। ऐसे में केवल समय-सीमा तय कर देने से समस्या का पूर्ण समाधान संभव नहीं होगा।
आवश्यक है कि न्यायिक सुधारों को व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाए। रिक्त पदों पर शीघ्र नियुक्ति, अदालतों के बुनियादी ढांचे का विस्तार, तकनीक-आधारित प्रबंधन प्रणाली, अनावश्यक स्थगनों पर नियंत्रण और मुकदमों के त्वरित निपटारे के लिए विशेष व्यवस्थाएं समय की मांग हैं। सरकार, न्यायपालिका और विधि समुदाय को मिलकर इस दिशा में ठोस प्रयास करने होंगे।
सुप्रीम कोर्ट का यह कदम एक स्पष्ट संदेश देता है कि न्यायिक विलंब अब सामान्य स्थिति नहीं माना जा सकता। लोकतंत्र की मजबूती न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर निर्भर करती है और विश्वसनीयता तभी कायम रहती है, जब न्याय समय पर उपलब्ध हो। इसलिए यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि नई व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि अदालतों की कार्यसंस्कृति में भी सकारात्मक परिवर्तन लाए। आखिरकार, विलंबित न्याय अनेक मामलों में न्याय से वंचित होने के समान ही होता है।






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