संपादकीय
04 Jun, 2026

बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता का नया विमर्श

कांग्रेस द्वारा बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता की नई अवधारणा के जरिए हिंदुत्व, धर्मनिरपेक्षता और समान नागरिक अधिकारों को लेकर देश की राजनीति में वैचारिक टकराव और बहस को और तेज किया गया है।

भोपाल, 04 जून।

कांग्रेस ऐसे भंवर में उलझ गई है कि उससे बाहर निकलने की उसकी हर कोशिश उसे नए बवंडर में फंसा देती है। भगवा आतंकवाद का नैरेटिव उसे सत्ता से विपक्ष तक ले आया। अब जब देश की राजनीति हिंदुत्व की धारा की ओर मुड़ चुकी है, तब कांग्रेस ‘बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता’ की नई थ्योरी प्रस्तुत कर रही है। बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता का अर्थ हिंदुत्व की राजनीति का विरोध, हिंदू विचारधारा का विरोध तथा राजनीति में हिंदुत्व के प्रतीकों और महापुरुषों का विरोध माना जा रहा है। सनातन संस्कृति में मतभेद बढ़ाने के प्रयास कांग्रेस के लिए नए नहीं हैं। आजादी के बाद से कांग्रेस भले ही इसे स्वीकार न करे, लेकिन उस पर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति करने के आरोप लगातार लगते रहे हैं।

दिग्विजय सिंह एक अनुभवी और प्रतिभाशाली राजनेता हैं। मध्य प्रदेश में 10 वर्ष मुख्यमंत्री रहने का अनुभव उनके पास है। वैचारिक रूप से वे स्वयं को साम्प्रदायिकता का विरोधी और प्रखर सनातनी बताते हैं। हाल ही में उन्होंने बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता की अवधारणा को सामने रखा। पंडित जवाहरलाल नेहरू की पुण्यतिथि पर उन्होंने कहा कि "अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता से अधिक खतरनाक बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता है।" साम्प्रदायिकता को समुदायों के आधार पर देखने और परिभाषित करने का इतिहास कांग्रेस के साथ लंबे समय से जुड़ा रहा है।

दिग्विजय सिंह के विचार कांग्रेस के लिए नए नहीं हैं। कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव के अपने घोषणा पत्र में भी इसी सोच को दोहराया था, जिसमें कहा गया था कि देश में बहुसंख्यकवाद नहीं चलेगा। आदर्श स्थिति तो यह है कि देश की व्यवस्था में किसी भी प्रकार का ‘वाद’ हावी न हो—न अल्पसंख्यकवाद और न बहुसंख्यकवाद। प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार और समान कानून प्राप्त हों।

बहुसंख्यक समाज जब अपने अधिकारों के लिए राजनीतिक रूप से सक्रिय हुआ, तब कांग्रेस को बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता का आभास होने लगा। जब तक अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति के माध्यम से उसकी सत्ता पर पकड़ बनी रही, तब तक उसे साम्प्रदायिकता से कोई विशेष आपत्ति नहीं थी।

कांग्रेस को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि समान नागरिक संहिता को देश के सभी नागरिकों पर लागू करने की पहल न करना किस प्रकार की धर्मनिरपेक्षता या साम्प्रदायिकता का उदाहरण है। देश में मस्जिदों, चर्चों और गुरुद्वारों के प्रबंधन का अधिकार संबंधित समुदायों के पास है, जबकि अनेक राज्यों में हिंदू मंदिरों का प्रबंधन सरकारी नियंत्रण में है। मंदिरों की आय और व्यवस्थाओं को लेकर लंबे समय से बहस चलती रही है। इसके लिए बने कई कानूनों की पृष्ठभूमि में भी कांग्रेस शासनकाल का उल्लेख किया जाता है।

यदि हिंदू मंदिरों का प्रबंधन भी अन्य धार्मिक संस्थाओं की तरह संबंधित समाज को सौंपने की मांग उठती है और इस विषय पर न्यायालयों में याचिकाएं दायर होती हैं, तो उसे साम्प्रदायिकता कहना उचित नहीं माना जा सकता। जब न्यायालयों में तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर निर्णय आते हैं, तब उन्हें वैचारिक चश्मे से देखने की प्रवृत्ति भी बहस का विषय बन जाती है।

कांग्रेस को यह भी बताना होगा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय हिंदू कोड बिल लागू किया गया, लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ को अलग व्यवस्था के रूप में बनाए रखा गया। यदि वक्फ बोर्ड जैसी संस्थागत व्यवस्था एक समुदाय के लिए बनाई गई, तो अन्य धार्मिक संस्थाओं के लिए वैसी ही संरचना पर पर्याप्त विचार क्यों नहीं हुआ? आज यदि इस विषय पर चर्चा होती है, तो उसे साम्प्रदायिकता का नाम दिया जाता है।

विभाजन के समय पाकिस्तान में रह गए हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों की सुरक्षा तथा भविष्य को लेकर भी अनेक वादे किए गए थे। बाद के वर्षों में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से प्रताड़ित होकर भारत आने वाले हिंदू शरणार्थियों की नागरिकता का प्रश्न लंबे समय तक राजनीतिक बहस का विषय बना रहा। केंद्र सरकार द्वारा लाए गए नागरिकता संशोधन कानून को लेकर भी देश में तीखी राजनीतिक बहस देखने को मिली।

राम जन्मभूमि आंदोलन, न्यायिक प्रक्रिया के बाद आए फैसले और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को यदि कोई बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता के रूप में देखता है, तो यह उसका दृष्टिकोण हो सकता है, लेकिन देश के एक बड़े वर्ग ने इसे अपनी आस्था और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े विषय के रूप में स्वीकार किया है।

मध्य प्रदेश की भोजशाला का मामला भी लंबे समय से न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा रहा है। अदालत के निर्णयों के बाद वहां की स्थिति को लेकर नई चर्चाएं शुरू हुई हैं। यदि इन घटनाओं को भी बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता की दृष्टि से देखा जाता है, तो यह राजनीतिक व्याख्या हो सकती है, लेकिन इससे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

हिंदू समाज के राजनीतिक और सामाजिक रूप से संगठित होने को यदि बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता कहा जाता है, तो यह बहस का विषय हो सकता है। कांग्रेस लंबे समय तक धर्मनिरपेक्षता की जिस व्याख्या को आगे बढ़ाती रही, उसके परिणामस्वरूप उत्पन्न राजनीतिक प्रतिक्रियाओं को भी समझना होगा। आज हिंदुत्व को चाहे जो नाम दिया जाए, यह स्पष्ट है कि वह भारतीय राजनीति का एक प्रभावशाली और निर्णायक तत्व बन चुका है।

बंगाल सहित विभिन्न राज्यों के चुनाव परिणामों के बाद हिंदुत्व विरोधी राजनीतिक शक्तियां अपने-अपने तरीके से परिस्थितियों का विश्लेषण कर रही हैं। ऐसे समय में यह आवश्यक है कि धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता जैसे विषयों पर विमर्श तथ्यों, संतुलन और समान नागरिक अधिकारों के आधार पर आगे बढ़े, न कि केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के आधार पर।

|
आज का राशिफल

मेष- कहीं रुका हुआ पैसा वसूलने में मदद मिल जाएगी। व्यर्थ प्रपंच में समय नहीं गंवाकर अपने काम पर ध्यान दीजिए। विरोधियों के सक्रिय होने की संभावना है। जमीन जायदाद का लाभ भी हो सकता है। श्रम साध्य कार्यों में सफल होंगे। भय तथा शत्रुहानि की आशंका रहेगी। शुभांक-5-6-7

आज का मौसम

भोपाल

24° / 37°

Light rain

ट्रेंडिंग न्यूज़