संपादकीय
29 May, 2026

असम में समान नागरिक संहिता लागू करने की तैयारी: आदिवासी छूट को लेकर बढ़ा राजनीतिक विवाद

असम विधानसभा द्वारा समान नागरिक संहिता विधेयक पारित किए जाने के बाद आदिवासी छूट और जनपरामर्श की कमी को लेकर राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है, जिससे यह मुद्दा अब राष्ट्रीय बहस का रूप लेता दिख रहा है।

गुवाहाटी, 29 मई।

असम विधानसभा ने लंबे और तीखे राजनीतिक विमर्श के बीच समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक को पारित कर दिया है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाली सरकार ने इसे महिलाओं के अधिकारों और सामाजिक सुधार की दिशा में बड़ा कदम बताया है, जबकि विपक्ष ने आदिवासी समुदायों को दी गई छूट, पर्याप्त जनपरामर्श की कमी और पहले से मौजूद कानूनों के बावजूद यूसीसी की आवश्यकता पर सवाल उठाए हैं।

यह विधेयक विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, लिव-इन रिलेशनशिप और उनसे जुड़े अन्य मामलों को विनियमित करने के उद्देश्य से लाया गया है। सरकार का कहना है कि इसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं को समान अधिकार देना, बहुविवाह और बाल विवाह जैसी प्रथाओं पर रोक लगाना तथा विवाह संबंधी मामलों में एक समान व्यवस्था सुनिश्चित करना है। मुख्यमंत्री ने विधानसभा में कहा कि जिन समुदायों की पारंपरिक व्यवस्थाएं संतुलित और प्रभावी हैं, वहां इस कानून के कुछ प्रावधानों से छूट दी गई है। इसी आधार पर राज्य के अनुसूचित जनजाति समुदायों को कई प्रावधानों से बाहर रखा गया है।

विपक्ष ने इस छूट को लेकर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यदि कानून का उद्देश्य समान नागरिक संहिता है, तो फिर अलग-अलग समुदायों के लिए अलग प्रावधान इसकी मूल भावना को कमजोर करते हैं। कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों ने यह भी आरोप लगाया कि इतने महत्वपूर्ण विधेयक पर व्यापक जनपरामर्श नहीं किया गया।

सरकार का पक्ष है कि यह कानून महिलाओं को संपत्ति, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मामलों में अधिक अधिकार देगा और सामाजिक समानता को मजबूत करेगा। विधेयक में विवाह और तलाक के पंजीकरण को अनिवार्य करने, लिव-इन संबंधों के पंजीकरण तथा कुछ मामलों में दंडात्मक प्रावधान शामिल किए गए हैं।

असम की सामाजिक संरचना में आदिवासी समुदायों और स्वायत्त परिषद क्षेत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका है, जहां परंपरागत व्यवस्थाएं लंबे समय से लागू हैं। ऐसे में सरकार का कहना है कि इन सांस्कृतिक व्यवस्थाओं का सम्मान करना आवश्यक है, इसलिए कुछ छूट दी गई है।

इसी वजह से यह मुद्दा अब केवल कानून तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक संतुलन से भी जुड़ गया है। अब यह बहस राष्ट्रीय स्तर पर और तेज होने की संभावना है, क्योंकि अन्य राज्यों में भी यूसीसी को लेकर चर्चा जारी है। 

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