भोपाल, 04 जून।
न्यायपालिका लोकतंत्र का तीसरा स्तंभ है, लेकिन जब कार्यपालिका ही इस स्तंभ को कमजोर करने लगे, तो व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। मध्यप्रदेश में अदालतों के आदेशों की अवमानना के 3,656 मामले लंबित हैं। इसका अर्थ है कि हजारों मामलों में न्यायालयों के निर्देशों का समय पर पालन नहीं हुआ। यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि कानून के शासन के लिए चिंता का विषय है।
अदालत की अवमानना का सीधा अर्थ है कि किसी न्यायिक आदेश का जानबूझकर पालन न करना। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर, इंदौर और ग्वालियर खंडपीठों में 29 मई, 2026 तक 3,656 अवमानना याचिकाएं लंबित थीं। यह आंकड़ा बताता है कि आदेशों के क्रियान्वयन की व्यवस्था में गंभीर खामियां मौजूद हैं।
कई उदाहरण स्थिति की गंभीरता को उजागर करते हैं। न्यायिक कर्मचारियों के वेतनमान से जुड़ा मामला वर्षों तक लंबित रहा। 2017 में दिए गए निर्देशों के बाद भी निर्णय नहीं हुआ और अंततः अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी। इसी प्रकार रीवा के एक अधिकारी के पदोन्नति प्रकरण में न्यायालय को वारंट जारी करने तक की नौबत आ गई। विश्वविद्यालयों से जुड़े मामलों में भी अदालत के आदेशों का समय पर पालन नहीं किया गया। ये घटनाएं बताती हैं कि समस्या किसी एक विभाग तक सीमित नहीं है।
इस स्थिति के पीछे कई कारण हैं। कई बार फाइलों का अनावश्यक चक्र, निर्णय लेने में देरी और जवाबदेही की कमी प्रमुख कारण बनते हैं। कुछ मामलों में राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक उदासीनता भी भूमिका निभाते हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि आदेशों की अवहेलना के बावजूद कठोर दंड के उदाहरण कम दिखाई देते हैं, जिससे भय का वातावरण समाप्त होता जा रहा है।
इसका सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिक को उठाना पड़ता है। वह पेंशनभोगी जो वर्षों से अपने अधिकार के लिए संघर्ष कर रहा है, वह कर्मचारी जिसे न्याय मिलने के बाद भी लाभ नहीं मिलता, या वह व्यक्ति जिसे अदालत का आदेश होने के बावजूद राहत नहीं मिलती—इन सबके मन में व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा होता है।
समाधान केवल आलोचना में नहीं, बल्कि प्रभावी सुधारों में है। न्यायालयों के आदेशों के पालन की नियमित निगरानी होनी चाहिए। जिन अधिकारियों के स्तर पर लापरवाही पाई जाए, उनकी व्यक्तिगत जवाबदेही तय हो। अवमानना मामलों के त्वरित निपटारे के लिए विशेष व्यवस्था बनाई जाए और प्रशासनिक स्तर पर समयबद्ध अनुपालन सुनिश्चित किया जाए।
लोकतंत्र में कोई भी व्यक्ति या संस्था कानून से ऊपर नहीं हो सकती। अदालतें निर्णय दे सकती हैं, लेकिन उन्हें लागू करना सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है। यदि न्यायालयों के आदेशों का सम्मान नहीं होगा, तो जनता का विश्वास भी कमजोर होगा। 3,656 लंबित अवमानना मामले केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि यह संकेत हैं कि व्यवस्था को आत्ममंथन और सुधार की आवश्यकता है। कानून का सम्मान ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है और इसे हर हाल में बनाए रखना होगा।






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