भोपाल, 4 जून।
भ्रष्टाचार भारत की सबसे पुरानी बीमारी है और सरकारी राशन व्यवस्था इसकी सबसे बड़ी प्रयोगशाला रही है। "गरीब का अनाज बिचौलिए खा जाते हैं"—यह जुमला हम दशकों से सुनते आए हैं। अब सरकार ने इसका इलाज टेक्नोलॉजी में ढूंढा है। कैबिनेट ने 'सार्थक-पीडीएस' योजना को 2031 तक बढ़ा दिया है और 80 करोड़ लाभार्थियों की पहचान, अनाज वितरण और धांधली रोकने का जिम्मा अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को सौंप दिया है। सवाल यह है कि क्या मशीन पर भरोसा करना भ्रष्टाचार का रामबाण इलाज है?
'स्मार्ट पीडीएस फेज-2' के तहत तीन सिस्टम लाए जा रहे हैं। 'निर्मल' नाम का सिस्टम रियल-टाइम एआई डेटाबेस बनाएगा। यह फर्जी राशन कार्ड, मरे हुए लोगों के नाम और डुप्लीकेट एंट्री को खुद पकड़ेगा। आधार, मोबाइल और बैंक खाते की क्रॉस-चेकिंग से 'घोस्ट बेनिफिशियरी' खत्म होंगे। वहीं, बहुभाषी चैटबॉट और आईवीआरएस सिस्टम के माध्यम से गरीब व्हाट्सऐप, फोन कॉल या चैटबॉट से सीधे शिकायत कर सकेगा। दावा है कि रोजाना 3 लाख शिकायतें हैंडल की जाएंगी, जिससे "साहब नहीं मिले" का बहाना खत्म होगा। इसके अलावा, राशन की गाड़ियों की जीपीएस ट्रैकिंग, बोरियों पर क्यूआर-कोड और एआई से मांग का सटीक अनुमान लगाया जाएगा। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव का दावा है कि इससे परिवहन दूरी 15 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक घटेगी, सालाना 280 करोड़ रुपये बचेंगे और कार्बन उत्सर्जन 35 प्रतिशत कम होगा।
पीडीएस में भ्रष्टाचार का मूल 'इंसानी इंटरफेस' है। कोटा डीलर से लेकर इंस्पेक्टर तक हर स्तर पर कमीशन तय है। फर्जी कार्ड बनाना, वजन में कटौती और मशीन में अंगूठा लगाकर राशन हड़पना—ये सब इंसानी खेल हैं। एआई को रिश्वत नहीं चाहिए। जब आधार से डीबीटी शुरू हुआ, तो 2.5 लाख करोड़ रुपये की लीकेज रुकी। अब एआई पैटर्न पहचानकर यह बता पाएगा कि कौन-सा डीलर हर महीने 100 प्रतिशत उठाव दिखा रहा है, जबकि गांव में अनाज नहीं पहुंचा, या कौन-सा मोबाइल नंबर 50 राशन कार्ड से लिंक है। इंसान यह नहीं पकड़ सकता, पर मशीन पकड़ लेगी।
हालांकि, इसके खतरे भी कम नहीं हैं। 'एआई बहिष्कार' का डर वास्तविक है। यदि एआई तकनीकी खराबी या मामूली त्रुटि के कारण किसी गरीब को सूची से बाहर कर दे, तो मशीन के पास संवेदना नहीं होती। एक बूढ़ी विधवा, जिसका अंगूठा घिस गया हो, वह सिस्टम के लिए 'फर्जी' हो जाएगी। साथ ही, 'कचरा अंदर, कचरा बाहर' का सिद्धांत भी लागू होता है। एआई उतना ही अच्छा है, जितना उसका डेटा। यदि निचले स्तर पर ही डेटा में छेड़छाड़ की गई, तो एआई भी उसे सही मान लेगा। इसके अलावा, डेटा की निगरानी और गोपनीयता भी एक बड़ा सवाल है।
राजस्थान में 'राज कॉम्पैक्ट एआई' के दौरान डीलरों द्वारा सर्वर डाउन करने जैसी घटनाएं यह बताती हैं कि जब तक डीलर-नेता-अफसर गठजोड़ पर कार्रवाई नहीं होगी, एआई सिर्फ एक शोपीस बनकर रह जाएगा। एआई हथियार है, ब्रह्मास्त्र नहीं। भ्रष्टाचार रोकने के लिए यह जरूरी है, पर पर्याप्त नहीं। यह तभी सफल होगा, जब इसके पीछे राजनीतिक इच्छाशक्ति हो। इसके साथ ही, अपील का आसान सिस्टम, ग्राम सभा को वीटो पावर, हर ब्लॉक में एआई सहायता केंद्र और दोषियों को तुरंत सजा का प्रावधान अनिवार्य है। अंततः, 80 करोड़ लोगों का पेट एआई के भरोसे छोड़ना एक क्रांतिकारी कदम है, लेकिन याद रहे कि मशीन सिर्फ एक टूल है। यदि उसे चलाने वाले की नियत साफ नहीं है, तो एआई भी भ्रष्टाचार का नया अड्डा बन सकता है। सार्थक-पीडीएस तभी सार्थक होगा जब टेक्नोलॉजी के साथ मानवीय संवेदनशीलता और जवाबदेही भी जुड़ी हो। वरना, गरीब का निवाला लूटने वाला इंसान नहीं, एल्गोरिदम होगा।











