संपादकीय
04 Jun, 2026

एसआईआर और राजनीतिक दलों के मंतव्य

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को वैधता प्रदान करते हुए चुनाव आयोग की भूमिका को सशक्त समर्थन दिया है तथा इस विषय पर उठ रहे राजनीतिक आरोपों को एक नई बहस के केंद्र में स्थापित कर दिया है।

नई दिल्ली, 04 जून ।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को वैधानिक और संवैधानिक प्रक्रिया मानते हुए दिए गए निर्णय ने इस पूरे विवाद पर महत्वपूर्ण स्पष्टता प्रदान की है। अदालत के फैसले के बाद चुनाव आयोग की कार्रवाई को कानूनी आधार मिला है और इस मुद्दे पर उठाए जा रहे कई राजनीतिक आरोपों को भी चुनौती मिली है।

एसआईआर को लेकर विरोध दर्ज कराने वाले विभिन्न समूहों और राजनीतिक दलों की ओर से अब न्यायालय के फैसले पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। कुछ सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं का तर्क है कि इस निर्णय से चुनाव आयोग की शक्तियां बढ़ेंगी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि भविष्य में मतदाता चयन की प्रक्रिया को लेकर नए विवाद खड़े हो सकते हैं। दूसरी ओर, इस फैसले के बाद मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों और वोट चोरी जैसे आरोपों की धार कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है।

फैसले के बाद यह भी प्रचारित किया जा रहा है कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उनकी नागरिकता भी संदेह के घेरे में आ जाएगी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मतदाता सूची में नाम शामिल करने या हटाने के लिए चुनाव आयोग सीमित दायरे में नागरिकता से जुड़े दस्तावेजों की जांच कर सकता है। अदालत ने यह भी साफ कहा है कि मतदाता सूची में नाम न होने का अर्थ किसी व्यक्ति की नागरिकता समाप्त होना नहीं माना जा सकता।

दस्तावेजों के अभाव में जिन व्यक्तियों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उनकी सूची गृह मंत्रालय को भेजी जाएगी। निर्धारित प्रक्रिया के तहत नागरिकता से संबंधित सक्षम समिति इन मामलों पर विचार करेगी। पश्चिम बंगाल में तार्किक विसंगतियों से जुड़े जो प्रकरण न्यायिक आयोग के समक्ष लंबित हैं, उन्हें लेकर भी यह प्रचार किया जा रहा है कि संबंधित लोगों को चुनावी प्रक्रिया में भागीदारी का अवसर नहीं मिला, जबकि इस प्रकार के दावों को लेकर भी विवाद बना हुआ है।

देश की आबादी करीब 145 करोड़ मानी जाती है। पिछले लोकसभा चुनाव में लगभग 97 करोड़ मतदाता पंजीकृत थे, जिनमें से करीब 64 करोड़ लोगों ने मतदान किया। इसका अर्थ यह है कि बड़ी संख्या में ऐसे मतदाता भी थे, जिनके नाम सूची में दर्ज होने के बावजूद उन्होंने मतदान प्रक्रिया में भाग नहीं लिया।

राजनीतिक दल और सक्रिय राजनीतिक समूह इस तथ्य से परिचित हैं कि मतदान करना या न करना किसी व्यक्ति की नागरिकता का प्रमाण नहीं होता। इसी प्रकार सरकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त करने का भी मतदाता सूची से सीधा संबंध नहीं है। इसके बावजूद इस विषय को लेकर विभिन्न प्रकार की आशंकाएं और आरोप लगातार सामने लाए जाते रहे हैं।

पूर्व में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को लेकर भी इसी तरह के प्रश्न उठाए गए थे। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा था और अदालत ने प्रक्रिया को वैध माना था। उसके बाद उस विवाद की तीव्रता में कमी आई थी।

मतदाता सूची को लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला माना जाता है। यदि मतदाता सूची में त्रुटियां हों तो निर्वाचन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी प्रश्न खड़े हो सकते हैं। विशेष गहन पुनरीक्षण कोई नई व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह प्रक्रिया पहले भी समय-समय पर अपनाई जाती रही है। मतदान का अधिकार केवल भारत के नागरिकों को प्राप्त है।

यह तर्क अक्सर सामने आता है कि चुनाव आयोग के पास नागरिकता निर्धारित करने का अधिकार नहीं है। यह तथ्य सही है, लेकिन मतदाता सूची तैयार करना और पात्र मतदाताओं का निर्धारण करना आयोग का संवैधानिक दायित्व है। इसी कारण आयोग को ऐसे दस्तावेजों की जांच करने का अधिकार और जिम्मेदारी दोनों प्राप्त हैं, जिनसे किसी व्यक्ति की पात्रता की पुष्टि हो सके।

इस बार एसआईआर को लेकर जिस स्तर की राजनीतिक बहस देखने को मिली, वैसी स्थिति पहले कम ही देखने में आई है। मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन बनाए रखना केवल चुनाव आयोग का ही नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों का भी दायित्व माना जाता है। यह प्रक्रिया राजनीतिक दलों के अधिकृत प्रतिनिधियों और एजेंटों की भागीदारी से ही संचालित होती है।

राजनीतिक दलों को यह अधिकार दिया जाता है कि वे अपने-अपने बूथ क्षेत्रों में वास्तविक मतदाताओं की पहचान करें और उनके नाम मतदाता सूची में दर्ज कराने में सहयोग करें। इसी प्रकार ऐसे नामों की जानकारी भी दी जाती है, जिनके धारक अब जीवित नहीं हैं या जिन्होंने संबंधित क्षेत्र छोड़ दिया है, ताकि सूची को अद्यतन रखा जा सके।

यदि कोई राजनीतिक दल मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर चुनाव आयोग की मंशा और संवैधानिक अधिकारों पर सवाल उठाता है, तो इसे उसकी संगठनात्मक कमजोरी के रूप में भी देखा जा सकता है। बिहार में एसआईआर के संबंध में दायर लगभग 20 याचिकाओं का निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया। इन याचिकाओं में कई प्रमुख विपक्षी दल और अन्य याचिकाकर्ता शामिल थे।

सुनवाई के दौरान अदालत की ओर से अवसर दिए जाने के बावजूद विपक्ष की तरफ से ऐसा कोई मतदाता प्रस्तुत नहीं किया जा सका, जो यह प्रमाणित कर सके कि सभी आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध होने के बावजूद उसका नाम मतदाता सूची से हटाया गया हो।

यह भी देखा गया है कि राजनीतिक दल चुनाव में सफलता मिलने पर चुनावी व्यवस्था की निष्पक्षता स्वीकार करते हैं, लेकिन पराजय की स्थिति में चुनाव आयोग और पूरी निर्वाचन प्रक्रिया पर प्रश्न उठाने लगते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय अंतिम और सर्वोपरि माना जाता है। विभिन्न राजनीतिक प्रतिक्रियाओं के बावजूद आम तौर पर जनता न्यायपालिका पर विश्वास रखती है। चुनाव आयोग को लेकर जो आरोप लगाए गए थे, इस फैसले के बाद उसकी संस्थागत विश्वसनीयता को भी मजबूती मिलने की चर्चा हो रही है। इसके बावजूद कुछ राजनीतिक नेता अभी भी मतदाता सूची और वोट संबंधी आरोपों को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में केवल आरोपों के आधार पर राजनीति लंबे समय तक नहीं चल सकती। संविधान और संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार प्रश्नचिह्न लगाने की प्रवृत्ति अंततः राजनीतिक रूप से भी नुकसानदायक साबित हो सकती है। लोकतंत्र की मजबूती किसी भी दल की चुनावी जीत या हार से कहीं अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है और इसकी बुनियाद को कमजोर करने वाले प्रयास अंततः राजनीतिक नेतृत्व को भी प्रभावित कर सकते हैं।

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