04 जून, भोपाल।
राज्यसभा की एक सीट के लिए मध्यप्रदेश कांग्रेस में फिर वही पुरानी कहानी दोहराई जा रही है—‘एक अनार, सौ बीमार’। जून में खाली हो रही राज्यसभा सीट को लेकर अंदरूनी हलचल तेज हो गई है। दिल्ली से भोपाल तक लॉबिंग का दौर शुरू हो चुका है, लेकिन समस्या वही है जो पिछले दो दशकों से कांग्रेस को परेशान कर रही है—गुटबाजी, बदलती रणनीति और सर्वमान्य नेता का अभाव।
खबरों से साफ है कि पार्टी अभी तय नहीं कर पाई है कि उम्मीदवार कौन होगा—बाहरी या स्थानीय, युवा या अनुभवी, जातिगत समीकरण वाला चेहरा या जीत की गारंटी देने वाला उम्मीदवार। नतीजतन, फैसला फिर दिल्ली के पाले में जाता दिखाई दे रहा है।
राज्यसभा की इस एक सीट के लिए कांग्रेस में कम से कम चार धाराएं सक्रिय हैं। एक धारा चाहती है कि राष्ट्रीय स्तर का कोई बड़ा चेहरा, जो संसद में सरकार को प्रभावी ढंग से घेर सके, मध्यप्रदेश से राज्यसभा भेजा जाए। तर्क यह है कि प्रदेश में पार्टी विपक्ष में है, इसलिए राज्यसभा में मजबूत और आक्रामक आवाज की जरूरत है।
दूसरी ओर, प्रदेश संगठन का एक वर्ग मानता है कि स्थानीय और जमीनी नेता को अवसर मिलना चाहिए, जिससे कार्यकर्ताओं में उत्साह पैदा हो। बाहरी उम्मीदवारों को लेकर पहले भी असंतोष सामने आता रहा है। तीसरी धारा जातिगत समीकरणों को साधने की पक्षधर है। एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक वर्गों के नेताओं के नाम चर्चा में हैं। वहीं, कुछ नेता ऐसे चेहरे की तलाश में हैं जो गुटों से ऊपर उठकर संगठन में व्यापक सहमति बना सके। समस्या यह है कि कांग्रेस में अब ‘सर्वमान्य’ चेहरा खोजना लगातार कठिन होता जा रहा है।
इसी कारण हर कुछ दिनों में रणनीति बदलती दिखाई देती है। कभी युवा चेहरे की बात होती है, कभी अनुभवी सांसद की, तो कभी महिला उम्मीदवार की संभावना पर चर्चा शुरू हो जाती है। इस असमंजस से कार्यकर्ता भी भ्रमित हैं और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी इसे कांग्रेस की कमजोरी के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
मध्यप्रदेश कांग्रेस में गुटबाजी कोई नई बात नहीं है। कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, अरुण यादव, जीतू पटवारी और उमंग सिंघार जैसे नेताओं के अलग-अलग प्रभाव क्षेत्र हैं। राज्यसभा चुनाव आते ही यह विभाजन अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगता है। पिछले वर्षों में कई मौकों पर पार्टी को इसका नुकसान उठाना पड़ा है। क्रॉस वोटिंग और विधायकों की नाराजगी लगातार चिंता का विषय रही है।
वर्तमान विधानसभा में कांग्रेस के पास 66 विधायक हैं। एक सीट जीतने के लिए आवश्यक संख्या से वह बहुत अधिक दूरी पर नहीं है, लेकिन यदि आंतरिक असंतोष बढ़ा, तो स्थिति जटिल हो सकती है। यही कारण है कि उम्मीदवार चयन को लेकर सावधानी जरूरी मानी जा रही है।
बाहरी बनाम स्थानीय उम्मीदवार का विवाद भी नया नहीं है। प्रदेश नेतृत्व का एक वर्ग स्पष्ट रूप से चाहता है कि मौका मध्यप्रदेश के किसी नेता को मिले। वहीं, राष्ट्रीय नेतृत्व का तर्क है कि राज्यसभा केवल प्रतिनिधित्व का मंच नहीं, बल्कि नीति और राष्ट्रीय बहस का सदन भी है। इसलिए ऐसे व्यक्ति का चयन होना चाहिए जो राष्ट्रीय मुद्दों पर प्रभावी ढंग से अपनी बात रख सके।
जातिगत समीकरण भी पार्टी के लिए चुनौती बने हुए हैं। आदिवासी, अनुसूचित जाति और ओबीसी वर्गों के बीच संतुलन साधना आसान नहीं है। किसी एक वर्ग को प्राथमिकता देने पर दूसरे वर्गों में असंतोष की आशंका बनी रहती है। सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाली कांग्रेस खुद इसी संतुलन के जटिल समीकरण में उलझी नजर आती है।
भाजपा इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। उसके पास पर्याप्त संख्या बल है और वह अपनी सीटों को लेकर आश्वस्त है। ऐसे में कांग्रेस की आंतरिक खींचतान उसके लिए राजनीतिक अवसर भी बन सकती है।
दरअसल, यह चुनाव केवल एक राज्यसभा सीट का चुनाव नहीं है। यह इस बात की परीक्षा भी है कि क्या कांग्रेस 2023 की हार के बाद खुद को संगठित कर पाई है या नहीं। क्या पार्टी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर सामूहिक निर्णय ले सकती है? ‘एक अनार, सौ बीमार’ की स्थिति इसलिए बनती है क्योंकि हर नेता स्वयं को सबसे उपयुक्त मानता है और संगठन पीछे छूट जाता है।
जब तक ‘मैं’ की जगह ‘हम’ की भावना नहीं आएगी, तब तक दिल्ली से भोपाल तक लॉबिंग चलती रहेगी, रणनीतियां बदलती रहेंगी और संगठनात्मक कमजोरी बनी रहेगी। राज्यसभा की यह सीढ़ी संसद तक जरूर जाती है, लेकिन कांग्रेस के लिए यह कार्यकर्ताओं के भरोसे और संगठन की एकजुटता की भी परीक्षा है। जनता चेहरों से अधिक एकजुटता देखना चाहती है। फिलहाल कांग्रेस के पास चेहरे तो अनेक हैं, लेकिन एकजुटता अभी भी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।











