भोपाल, 4 जून।
मध्य प्रदेश में सरकार और विपक्ष का विमर्श अब नीतियों पर नहीं, बल्कि व्यक्तिगत बयानों पर सिमट गया है। कांग्रेस खुद को सत्ता की पार्टी मानती है, लेकिन विपक्ष की भूमिका उसे रास नहीं आती। जबकि विपक्ष एक प्रकार की 'शैडो कैबिनेट' होता है, जिसके पास राज्य के लिए अपनी नीतियां और कार्यक्रम होने चाहिए। सरकार की आलोचना के साथ विपक्ष की जिम्मेदारी विकल्प पेश करना भी है। विकल्पहीन आलोचना न तो जनता को प्रभावित करती है और न ही राज्य के विकास में कोई भूमिका निभाती है।
राज्य में कांग्रेस चुनावी राजनीति तक सिमटती जा रही है। लोकसभा चुनाव में पार्टी का खाता भी नहीं खुला। ताजा राज्यसभा चुनाव में भी कड़ी प्रतिस्पर्धा है और उम्मीदवारों को लेकर वफादारी तथा बगावत की चर्चाएं सार्वजनिक हैं। दिल्ली से लेकर भोपाल तक कांग्रेस का संगठन बिखरा हुआ नजर आता है। मुख्यमंत्री पद के दावेदार बहुत हैं, लेकिन समर्पित कार्यकर्ता खोजना मुश्किल है। नेता अपनी फॉलोइंग साबित करने के लिए सोशल मीडिया पोस्ट पर निर्भर हैं।
राज्य में पक्ष और विपक्ष के बीच संतुलन तो है, लेकिन सतही बयानबाजी के अलावा कांग्रेस कोई गंभीर मुद्दा या जन आंदोलन खड़ा नहीं कर पाई है। भ्रष्टाचार या सिस्टम की विफलता के किसी भी ठोस मामले को उजागर करने में पार्टी विफल रही है। इसके विपरीत, मुख्यमंत्री मोहन यादव अपनी सरकार के कामकाज में व्यस्त हैं।
हाल ही में मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के बीच शब्दों की मर्यादा टूटी है। जीतू पटवारी राज्य में वैसा ही करने की कोशिश कर रहे हैं, जैसा राहुल गांधी राष्ट्रीय स्तर पर करते हैं। यदि पटवारी मुख्यमंत्री को 'अभिनंदन लाल' कहते हैं, तो मुख्यमंत्री भी उन्हें 'टपोरी लाल' कहने से नहीं चूकते। तीन साल में पहली बार मोहन की बांसुरी की धुन कुछ बेसुरी सुनाई पड़ी है। भाजपा सामान्यतः अपनी भाषा और शैली को लेकर सतर्क रहती है, इसलिए इस बेसुरापन की चर्चा अधिक हो रही है। ऐसी अपेक्षा भाजपा नेताओं से नहीं की जाती।
मुख्यमंत्री ने जीतू पटवारी की बयानबाजी को इतनी तीखी प्रतिक्रिया देकर अनावश्यक महत्व क्यों दिया, यह राजनीतिक विश्लेषकों के लिए चर्चा का विषय है। सरकार चलाना सबसे चुनौतीपूर्ण कार्य है। भाजपा का संगठन कांग्रेस से कहीं अधिक मजबूत और फीडबैक पर आधारित है। कांग्रेस में परिवारवाद और व्यक्तिवाद हावी है, और कमलनाथ सरकार के पतन के कारण आज भी वहां विद्यमान हैं। क्रॉस वोटिंग की आशंका कांग्रेस के भीतर की अस्थिरता को दर्शाती है।
पद पर बैठे व्यक्ति के लिए भाषा, शब्दावली और व्यवहार को लेकर सचेत रहना आवश्यक है। विश्वसनीयता केवल प्रदर्शन से नहीं, शिष्टाचार से भी स्थापित होती है। सरकार चलाने वाले दल पर मर्यादाओं का पालन करने की अतिरिक्त जिम्मेदारी होती है, जबकि विपक्ष तो किसी भी प्रकार का आरोप लगा सकता है। राहुल गांधी की भाषा का नुकसान अंततः उन्हें ही हो रहा है।
विपक्ष का सुर बेसुरा हो सकता है, लेकिन सरकार के मुखिया से मिठास की ही अपेक्षा की जाती है। मोहन की बांसुरी तो लोगों को मंत्रमुग्ध करने के लिए जानी जाती है, उसमें से निकलने वाले बेसुरे सुर सभी को चौंकाते हैं। बातों का बतंगड़ छोड़कर प्रशासन से ऐसे सुर निकलें कि जनता को सुकून महसूस हो।






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