संपादकीय
02 Jun, 2026

एसआईआर को सुप्रीम मंजूरी: चुनाव आयोग के अधिकार बरकरार, 7.41 करोड़ नाम कटने पर बढ़ी बहस

सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर को वैध ठहराते हुए चुनाव आयोग के अधिकारों को बरकरार रखा, जिससे मतदाता सूची से 7.41 करोड़ नाम हटने को लेकर जारी राजनीतिक और सामाजिक बहस और तेज हो गई है।

नई दिल्ली, 02 जून ।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर को वैध ठहराते हुए चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र पर उठे सवालों पर विराम लगा दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए आयोग को ऐसी प्रक्रिया अपनाने का पूरा अधिकार प्राप्त है। यह फैसला उन याचिकाओं पर आया है जिनमें पिछले वर्ष जून में बिहार से शुरू हुई एसआईआर प्रक्रिया को चुनौती दी गई थी।

चुनाव आयोग ने वर्ष 2025 में बिहार से एसआईआर की शुरुआत की थी और इसके बाद दो चरणों में इसे 10 राज्यों तथा 3 केंद्र शासित प्रदेशों में लागू किया गया। इस दौरान कुल 7.41 करोड़ नाम मतदाता सूची से हटाए गए। इस कार्रवाई के खिलाफ एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स, योगेंद्र यादव, महुआ मोइत्रा, मनोज झा, के.सी. वेणुगोपाल और सुप्रिया सुले सहित कई याचिकाकर्ता सर्वोच्च अदालत पहुंचे थे।

याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि एसआईआर के जरिए चुनाव आयोग परोक्ष रूप से नागरिकता की जांच कर रहा है और पहले से पंजीकृत मतदाताओं से दोबारा दस्तावेज मांगना कानूनी सीमा से बाहर है। उनका कहना था कि नागरिकता का निर्धारण केवल नागरिकता कानून के तहत ही हो सकता है, जबकि आयोग के पास यह अधिकार नहीं है। हालांकि अदालत ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि एसआईआर न तो प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 का स्थान लेती है और न ही उसके प्रावधानों को कमजोर करती है, बल्कि यह केवल मतदाता सूची को अधिक शुद्ध बनाने की प्रक्रिया है।

सुनवाई के दौरान आयोग ने भी पक्ष रखते हुए कहा कि एसआईआर का उद्देश्य नागरिकता तय करना नहीं, बल्कि मतदाता सूची की त्रुटियों को दूर करना है ताकि केवल वास्तविक पात्र मतदाता ही सूची में बने रहें। आयोग ने इसे एक सरल और सॉफ्ट-टच प्रक्रिया बताया, जो एनआरसी जैसी कठोर जांच नहीं है। आयोग के अनुसार शहरीकरण, पलायन, मृत्यु और दोहरी प्रविष्टियों के कारण सूची में व्यापक त्रुटियां थीं, जिन्हें इस प्रक्रिया से ठीक किया गया।

इस फैसले का राजनीतिक स्तर पर भी मिश्रित प्रभाव देखा गया। एक पक्ष ने इसे स्वागत योग्य बताया, जबकि कुछ नेताओं ने मतदाता नाम कटने को लेकर सवाल उठाए। कई याचिकाकर्ताओं ने आशंका जताई कि इस प्रक्रिया से गरीब, प्रवासी मजदूर और वंचित वर्ग प्रभावित हो सकते हैं। उनका कहना है कि लोकतंत्र में एक भी पात्र मतदाता का नाम सूची से हटना गंभीर विषय है।

आयोग के आंकड़ों के अनुसार एसआईआर के दौरान बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और मध्यप्रदेश में सबसे अधिक नाम हटाए गए, जिनमें मृत, डुप्लीकेट और स्थायी रूप से स्थानांतरित मतदाता शामिल थे। आयोग का दावा है कि इस शुद्धिकरण से आगामी चुनावों में पारदर्शिता बढ़ेगी और फर्जी मतदान पर रोक लगेगी।

हालांकि इस पूरे मुद्दे पर कानूनी विवाद भले समाप्त हो गया हो, लेकिन राजनीतिक और सामाजिक बहस अभी भी जारी है। अब निगाहें इस पर हैं कि आयोग इस प्रक्रिया को कितना पारदर्शी और समावेशी बनाए रखता है।

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