संपादकीय
04 Jun, 2026

जब कुर्सी, वर्दी और स्टेथोस्कोप, तीनों दागदार हो जाएं, तो इंसाफ कौन देगा?

ट्विशा शर्मा की संदिग्ध मौत मामले में जांच प्रक्रिया, साक्ष्यों की देरी और पोस्टमार्टम को लेकर उठे सवालों ने पुलिस, चिकित्सा और न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर चिंता खड़ी कर दी है।

04 जून, भोपाल

ट्विशा शर्मा की मौत का मामला अब सिर्फ एक युवती की संदिग्ध मौत का प्रकरण नहीं रह गया है। यह भारतीय न्याय व्यवस्था, पुलिस जांच और चिकित्सा तंत्र की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। जिस व्यवस्था पर सच सामने लाने की जिम्मेदारी है, उसी पर सच को दबाने के गंभीर आरोप लग रहे हैं।

13 मई की सुबह पुलिस ने इसे आत्महत्या बताया, जबकि परिजनों का आरोप है कि यह एक सुनियोजित हत्या है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जांच के दौरान महत्वपूर्ण साक्ष्यों को समय पर सुरक्षित क्यों नहीं किया गया? सीसीटीवी फुटेज के अनुसार, 12 मई की रात ट्विशा हाथ में हेडफोन लेकर छत पर गई थी, लेकिन पुलिस ने हेडफोन 11 दिन बाद जब्त किया। लैपटॉप और अन्य डिजिटल साक्ष्य भी कई दिनों की देरी से कब्जे में लिए गए। ऐसे मामलों में हर मिनट महत्वपूर्ण होता है, फिर इतनी देरी क्यों हुई?

पोस्टमार्टम रिपोर्ट को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि कई महत्वपूर्ण तथ्यों को स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं किया गया। गले में इस्तेमाल हुई बेल्ट को पोस्टमार्टम टीम को समय पर उपलब्ध नहीं कराया गया। यदि ऐसा हुआ है, तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि पूरी जांच प्रक्रिया पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।

मामले का सबसे संवेदनशील पहलू एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश का नाम सामने आना है। आरोप हैं कि प्रभाव और रसूख का इस्तेमाल कर मामले को आत्महत्या का स्वरूप देने की कोशिश की गई। ये आरोप सिद्ध हों या न हों, लेकिन इनकी निष्पक्ष जांच होना अनिवार्य है। न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास है, और जब न्याय देने वालों पर ही सवाल उठने लगें, तो चिंता होना स्वाभाविक है।

पुलिस की भूमिका भी कटघरे में है। घटनास्थल को सुरक्षित रखने, डिजिटल साक्ष्यों को संरक्षित करने और जांच की पारदर्शिता सुनिश्चित करने में यदि कहीं भी चूक हुई है, तो उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। जांच में लापरवाही भी न्याय में बड़ी बाधा बनती है।

अब यह मामला सीबीआई के पास है। एजेंसी के सामने चुनौती केवल घटना की सच्चाई सामने लाने की नहीं, बल्कि व्यवस्था पर उठे सवालों का जवाब देने की भी है। यदि किसी स्तर पर पुलिस अधिकारी, चिकित्सक या अन्य प्रभावशाली व्यक्ति दोषी पाए जाते हैं, तो उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।

ट्विशा की मां का एक ही सवाल है—"मेरी बेटी को इंसाफ कौन देगा?" यही सवाल आज पूरा समाज पूछ रहा है। इस मामले में निष्पक्ष और पारदर्शी जांच केवल एक परिवार को न्याय दिलाने का विषय नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था में जनता के विश्वास को बनाए रखने की भी एक बड़ी परीक्षा है।

जब रक्षक ही संदेह के घेरे में आ जाएं, तब न्याय की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। उम्मीद है कि सच सामने आएगा और दोषियों को उनके पद, प्रतिष्ठा या प्रभाव से परे जाकर जवाबदेह ठहराया जाएगा। तभी न्याय केवल होगा ही नहीं, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देगा।

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