संपादकीय
04 Jun, 2026

टीईटी पास, किस्मत फेल: शिक्षा व्यवस्था में योग्यता बनाम जुगाड़ का विरोधाभास

मध्यप्रदेश में टीईटी पास हजारों शिक्षक वर्षों से नियुक्ति का इंतजार कर रहे हैं तथा लाखों रिक्त पदों पर अतिथि शिक्षकों की निर्भरता से शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता और स्थायित्व पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

भोपाल, 04 जून।

मध्य प्रदेश में शिक्षा का हाल देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो सरकार ने ‘योग्यता’ और ‘जरूरत’ के बीच एक बड़ी दीवार खड़ी कर दी है। एक तरफ 2018 से टीईटी (TET) और चयन परीक्षा पास कर चुके 15 हजार से अधिक योग्य शिक्षक नियुक्ति पत्र के लिए वर्षों से इंतजार कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ उन्हीं के हक के 1,15,678 रिक्त पदों पर 80 हजार अतिथि शिक्षकों के भरोसे काम चलाया जा रहा है। सवाल सीधा है—जब घर में पक्का भोजन तैयार है, तो सरकार बाजार के भरोसे बच्चों को ‘मिड-डे मील’ क्यों परोस रही है?

पहला सवाल यह है कि टीईटी पास शिक्षकों को आखिर इंतजार क्यों कराया जा रहा है? राहुल द्विवेदी जैसे हजारों युवा हैं, जिन्होंने मार्च 2023 में पात्रता परीक्षा और अगस्त में चयन परीक्षा पास की। 20 फरवरी 2025 को अंतिम मेरिट सूची में नाम आया। 80-85 अंक लाकर शीर्ष स्थान प्राप्त करने के बावजूद, आठ महीने बाद भी नियुक्ति पत्र नहीं मिला। 2018 से अब तक वर्ग-1, वर्ग-2 और वर्ग-3 के लगभग 15 हजार अभ्यर्थी चयनित हो चुके हैं। इनमें से कई 40 वर्ष की आयु पार कर चुके हैं और कई आयु सीमा के अंतिम चरण में हैं। उन्होंने कठिन परीक्षाएं पास कीं, दस्तावेज सत्यापन कराया, फिर भी नियुक्ति नहीं मिली।

स्कूल शिक्षा मंत्री का कहना है कि प्रक्रिया निरंतर चल रही है और नियमानुसार आदेश जारी किए जा रहे हैं। लेकिन यदि छह वर्षों में 15 हजार नियुक्तियां नहीं हो पाईं, तो 1.15 लाख पद भरने में कितने वर्ष लगेंगे? ‘नियमानुसार’ की आड़ में युवाओं की उम्र और उम्मीद दोनों खत्म हो रही हैं। यह केवल देरी नहीं, बल्कि योग्यता का अपमान है।

दूसरा सवाल यह है कि लाखों बच्चों का भविष्य अतिथि शिक्षकों के भरोसे क्यों छोड़ा जा रहा है? स्कूल शिक्षा विभाग के आंकड़े चिंताजनक हैं। प्रदेश में 2,89,005 स्वीकृत पद हैं, जबकि केवल 1,74,419 पदों पर शिक्षक कार्यरत हैं। यानी 1,15,678 पद रिक्त हैं। प्राथमिक स्तर पर 55,626, माध्यमिक स्तर पर 44,546 और हाईस्कूल स्तर पर 15,506 शिक्षकों की कमी है।

कैग (CAG) की रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि राज्य छात्र-शिक्षक अनुपात बनाए रखने में विफल रहा है। जहां 35 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक होना चाहिए, वहां कई स्थानों पर 80 से 100 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक है। इस कमी को पूरा करने के लिए विभाग वर्ष 2025-26 में 77,491 अतिथि शिक्षक रखने जा रहा है। इनमें वर्ग-1 के 13,502, वर्ग-2 के 42,957 और वर्ग-3 के 21,032 पद शामिल हैं।

प्रश्न यह है कि अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति का आधार क्या है? केवल शैक्षणिक योग्यता। न कोई चयन परीक्षा, न प्रतिस्पर्धी मेरिट और न स्थायित्व। दस महीने पढ़ाइए, फिर अगले वर्ष नई प्रक्रिया। ऐसे में जिस बच्चे को पांच वर्षों में पांच अलग-अलग शिक्षक पढ़ाएंगे, उसकी शैक्षणिक नींव कितनी मजबूत होगी? अतिथि शिक्षक का वेतन सीमित है, नौकरी की सुरक्षा नहीं है और प्रशिक्षण भी पर्याप्त नहीं होता।

सरकार का तर्क है कि जिन स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं, वहां अतिथि शिक्षकों की व्यवस्था की जा रही है। लेकिन स्थायी बीमारी का इलाज अस्थायी पट्टी से कब तक किया जाएगा? 1.15 लाख पद रिक्त होना एक तरह की शैक्षणिक आपात स्थिति है और आपात स्थिति में जुगाड़ नहीं, युद्धस्तर पर कार्रवाई की जाती है।

इस व्यवस्था का सबसे बड़ा नुकसान बच्चों को हो रहा है। लाखों विद्यार्थी नियमित शिक्षकों के अभाव में पढ़ाई कर रहे हैं। दूसरी ओर चयनित अभ्यर्थियों के साथ भी अन्याय हो रहा है। यदि समस्या बजट की है, तो यह तर्क भी कमजोर है, क्योंकि अतिथि शिक्षकों पर भी हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं।

समाधान स्पष्ट है। 2018 से चयनित सभी 15 हजार शिक्षकों को प्राथमिकता के आधार पर नियुक्ति दी जाए। रिक्त पदों को भरने के लिए समयबद्ध भर्ती कैलेंडर जारी किया जाए। जहां चयनित अभ्यर्थी उपलब्ध हैं, वहां अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति से बचा जाए। छात्र-शिक्षक अनुपात को निर्धारित मानकों के अनुरूप लाना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।

सरकार को समझना होगा कि स्कूल कोई धर्मशाला नहीं है, जहां अतिथि आते-जाते रहें। यह संस्कार और ज्ञान का केंद्र है, जहां शिक्षक का स्थायित्व और गुणवत्ता दोनों आवश्यक हैं। जब तक कक्षा में नियमित, प्रशिक्षित और समर्पित शिक्षक नहीं होंगे, तब तक शिक्षा की गुणवत्ता केवल भाषणों तक सीमित रहेगी। इसलिए अब ‘नियमानुसार’ नहीं, बल्कि ‘न्यायानुसार’ निर्णय लेने का समय है।

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