चूरू, 04 जून ।
राजस्थान के चूरू में हाल ही में उठा भीषण धूलभरा तूफान केवल एक स्थानीय मौसमी घटना नहीं था, बल्कि उत्तर भारत के सामने खड़े एक बड़े पर्यावरणीय संकट की चेतावनी भी था। इस तूफान ने चूरू, हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, बीकानेर, नागौर, डीडवाना-कुचामन, अलवर और सीकर जैसे इलाकों को अपनी चपेट में लिया। तेज हवाओं ने घरों की छतें उखाड़ दीं, पेड़ गिरा दिए और जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया। लेकिन इस घटना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह हमें अरावली पर्वतमाला के उस अदृश्य योगदान की याद दिलाती है, जो दशकों से उत्तर भारत को थार मरुस्थल की बढ़ती धूल और रेतीले विस्तार से बचाती रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अरावली पर्वतमाला मौजूद न होती, तो पश्चिम से आने वाली धूलभरी हवाएं बिना किसी अवरोध के दिल्ली, हरियाणा और गंगा के मैदानी क्षेत्रों तक पहुंच जातीं। अरावली एक प्राकृतिक दीवार की तरह काम करती है, जो रेगिस्तानी धूल को रोकने में मदद करती है। जहां पर्वतमाला के साथ घना वृक्षावरण मौजूद है, वहां यह सुरक्षा और मजबूत हो जाती है। इसके विपरीत, जहां वन क्षेत्र घटे हैं, वहां धूल के प्रसार की आशंका बढ़ जाती है। यही कारण है कि अरावली का संरक्षण केवल राजस्थान का नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत के पर्यावरण और जनस्वास्थ्य का प्रश्न बन चुका है।
थार मरुस्थल में धूलभरे तूफान कोई नई बात नहीं हैं। अप्रैल से जून के बीच गर्म और शुष्क परिस्थितियों के कारण ऐसे तूफान नियमित रूप से आते हैं। जलवायु परिवर्तन ने इनकी आवृत्ति और तीव्रता दोनों को बढ़ा दिया है। भारतीय मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 1981-2010 की तुलना में हाल के वर्षों में उत्तर-पश्चिम भारत में धूलभरे तूफानों की संख्या में वृद्धि हुई है। इसका प्रभाव केवल दृश्यता कम होने तक सीमित नहीं रहता। धूल के महीन कण सांस संबंधी बीमारियों, आंखों की समस्याओं और हृदय रोगों का खतरा बढ़ाते हैं। कृषि भूमि की उर्वरता भी प्रभावित होती है और आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल असर पड़ता है।
चिंता की बात यह है कि अरावली स्वयं गंभीर संकट से गुजर रही है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के एक अध्ययन में सामने आया है कि राजस्थान में अरावली क्षेत्र का लगभग 32 प्रतिशत हिस्सा क्षरण का शिकार है। कई क्षेत्रों में पहाड़ियों की ऊंचाई घट रही है और मिट्टी का कटाव तेजी से बढ़ रहा है। अवैध खनन, अतिक्रमण, वनों की कटाई, अनियोजित शहरीकरण और आधारभूत संरचना परियोजनाओं ने इस प्राचीन पर्वतमाला को कमजोर किया है। एक अन्य अध्ययन के अनुसार, कुछ स्थानों पर वन क्षेत्र का क्षरण इतना गंभीर है कि पारिस्थितिक संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगा है।
सरकार ने अरावली पुनर्स्थापन के लिए एक व्यापक रूपरेखा तैयार की है, जिसमें खनन नियंत्रण, वनरोपण, जैव विविधता संरक्षण और भूमि प्रबंधन जैसे उपाय शामिल हैं। लेकिन केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं होगा। आवश्यकता है कि इन पर सख्ती से अमल हो और अरावली को विकास तथा पर्यावरण के बीच संतुलन की दृष्टि से देखा जाए।
अरावली केवल पहाड़ों की एक श्रृंखला नहीं, बल्कि उत्तर भारत की पर्यावरणीय सुरक्षा कवच है। यदि इसे बचाने में हम विफल रहे, तो धूलभरे तूफानों, प्रदूषण और भूमि क्षरण की कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ेगी। इसलिए, अरावली का संरक्षण अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्यता है।





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