सरकार व नीतियाँ
03 Jun, 2026

ग्रेट निकोबार परियोजना पर जयराम रमेश का केंद्र पर आरोप, पर्यावरण नियमों की अनदेखी का दावा

जयराम रमेश ने ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना में पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए ईआईए प्रक्रिया और मंजूरी पर सवाल उठाए हैं तथा केंद्र सरकार ने सभी मानकों के पालन का दावा किया है।

नई दिल्ली, 03 जून ।

पूर्व केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री तथा कांग्रेस महासचिव (संचार) जयराम रमेश ने ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना को लेकर केंद्र सरकार पर पर्यावरणीय नियमों और प्रक्रियाओं की अनदेखी करने का आरोप लगाते हुए केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव को एक बार फिर पत्र लिखकर कहा है कि परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन के दौरान कानून के शब्द और भावना दोनों का पूर्ण पालन नहीं किया गया है।

उन्होंने परियोजना से जुड़े पर्यावरण प्रभाव आकलन अध्ययनों, मंजूरी प्रक्रिया तथा राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा गठित उच्चाधिकार समिति की रिपोर्ट पर कई सवाल उठाए हैं और कहा है कि मार्च 2022 की ईआईए रिपोर्ट में स्वयं यह स्वीकार किया गया था कि यह अध्ययन केवल प्रारंभिक और त्वरित आकलन पर आधारित है।

रमेश के अनुसार मंत्रालय ने भी माना था कि पर्यावरणीय मंजूरी व्यापक ईआईए अध्ययनों पर आधारित नहीं थी, जिनमें तीन मौसमों के प्राथमिक आंकड़े शामिल होते हैं, जबकि इस परियोजना से जुड़े अध्ययन केवल कुछ सप्ताह में एकत्रित आंकड़ों पर आधारित रहे हैं, जो इतने बड़े और संवेदनशील क्षेत्र के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि पुराने उपलब्ध आंकड़ों के उपयोग का तर्क दिया जा रहा है, लेकिन परियोजना क्षेत्र से सीधे प्राप्त प्राथमिक आंकड़ों का कोई विकल्प नहीं हो सकता और बड़े विकास कार्यों में परियोजना-विशेष अध्ययन तथा प्रत्यक्ष डेटा संग्रह ही मूल आधार होना चाहिए।

कांग्रेस सांसद ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण के 3 अप्रैल 2023 के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि इसमें पर्यावरणीय मंजूरी में कई अनुत्तरित कमियों की ओर संकेत किया गया था और व्यापक पर्यावरण प्रभाव आकलन सहित कई मुद्दों पर पुनर्विचार की आवश्यकता जताई गई थी।

उन्होंने इसरो के स्पेस एप्लीकेशन सेंटर की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि गलाथिया खाड़ी के पूर्वी हिस्सों में तटीय कटाव के संकेत मिले हैं और ऐसे क्षेत्रों में बंदरगाह परियोजनाओं के लिए विस्तृत पर्यावरणीय अध्ययन अनिवार्य होते हैं, इसलिए बहु-मौसमी आकलन क्यों नहीं किया गया यह प्रश्न उठता है।

रमेश ने यह भी कहा कि परियोजना के अध्ययन तैयार करने वाले और उनकी समीक्षा करने वाले संस्थान एक ही प्रशासनिक ढांचे के तहत आते हैं, जिससे निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं, साथ ही उन्होंने 2009 के कार्यालय ज्ञापन और ईआईए दिशा-निर्देशों का भी उल्लेख किया जिनमें द्वीपीय बंदरगाह परियोजनाओं के लिए विस्तृत और बहु-मौसमी आंकड़े अनिवार्य बताए गए हैं।

गौरतलब है कि इससे पहले केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने उनके आरोपों का जवाब देते हुए कहा था कि ग्रेट निकोबार परियोजना का पर्यावरणीय मूल्यांकन सभी अधिसूचनाओं और प्रावधानों के अनुसार बहुस्तरीय रूप से किया गया है तथा परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय और जैव विविधता संबंधी मुद्दों की विधिवत जांच हो चुकी है, वहीं यह परियोजना लगभग 166 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में प्रस्तावित है जिसमें ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह, अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, ऊर्जा ढांचा और हरित तटीय शहर शामिल है तथा लगभग 13 हजार हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित होने का अनुमान है।

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