भोपाल, 4 जून।
वीवीआईपी का विदेश में इलाज और आम आदमी का रास्ते में दम तोड़ना—यह हमारे स्वास्थ्य तंत्र की सबसे कड़वी सच्चाई है। भितरवार की रेनू परिहार की मौत ने एक बार फिर प्रदेश की लचर स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी है। नेता और अधिकारी एयर एम्बुलेंस से एम्स या विदेश पहुंच जाते हैं, जबकि एक गरीब महिला 'रेफर' के खेल में अपनी जान गंवा देती है।
डबरा के भितरवार सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) की घटना ने पूरे प्रदेश के स्वास्थ्य तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है। 25 वर्षीय रेनू परिहार ने घर पर बच्ची को जन्म दिया। अत्यधिक रक्तस्राव के कारण हालत बिगड़ी, तो परिजन उसे सुबह 4:50 बजे अस्पताल ले आए। ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर ने बिना प्राथमिक उपचार दिए, एक घंटे बाद उसे ग्वालियर रेफर कर दिया। रात में वहां न तो गायनिक डॉक्टर उपलब्ध था और न ही ऑपरेशन थिएटर चालू था। रास्ते में ही रेनू ने दम तोड़ दिया, जबकि उसकी नवजात बच्ची बच गई। यह मात्र एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक 'बीमार सिस्टम' का परिणाम है।
मध्यप्रदेश में 'रेफरल' स्वास्थ्य विभाग का सबसे सुरक्षित शब्द बन गया है। भितरवार में मई माह में हुए 80 प्रसवों में से 27 महिलाओं को ग्वालियर रेफर कर दिया गया—यानी 30 प्रतिशत से अधिक। न प्राथमिक उपचार, न मरीज को स्थिर करने की कोशिश, बस सीधे बड़े अस्पताल भेज दो। ग्वालियर यहां से 70 किलोमीटर दूर है। खून की कमी या इमरजेंसी वाले मरीज अक्सर इसी एक घंटे के 'गोल्डन आवर' में रास्ते में ही जान गंवा देते हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में 12,000 से अधिक स्वास्थ्य केंद्र हैं, 400 से अधिक सीएचसी हैं और आयुष्मान भारत जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं हैं। फिर भी रेनू जैसी मौतें क्यों हो रही हैं? क्योंकि प्रदेश में 60 प्रतिशत विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद खाली पड़े हैं। भवन तो बना दिए गए और मशीनें भी खरीद ली गईं, लेकिन उन्हें चलाने वाले विशेषज्ञ गायब हैं। साथ ही, बजट लैप्स न हो, इसलिए साल के अंत में आनन-फानन में मशीनें खरीद ली जाती हैं, जो धूल फांकती रहती हैं।
संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को जीवन का अधिकार देता है, लेकिन व्यवहार में दो अलग स्वास्थ्य प्रणालियां चल रही हैं—एक वीआईपी संस्कृति के लिए और दूसरी आम जनता के लिए। जब किसी मंत्री या अधिकारी को मामूली तकलीफ होती है, तो सरकारी खर्च पर एयर एम्बुलेंस और मुख्यमंत्री राहत कोष के द्वार खुल जाते हैं। वहीं, आम आदमी के लिए आयुष्मान कार्ड भी निजी अस्पतालों के 'पैकेज कम है' वाले बहाने के सामने बेकार साबित हो जाता है।
स्वास्थ्य सेवा को नंबर वन बनाने के लिए भाषणों से अधिक ठोस इरादों की आवश्यकता है। सीएचसी में 24 घंटे गायनिक, एनेस्थेटिस्ट और शिशु रोग विशेषज्ञों की उपस्थिति अनिवार्य हो। प्रत्येक 'रेफरल' का ऑडिट हो और यदि मरीज को बिना स्थिर किए रेफर किया गया है, तो इसे गैर-कानूनी माना जाए। नेता और अफसर का पहला इलाज उसी जिले के सरकारी अस्पताल में हो, जहां वे पदस्थ हैं। हर महीने 'रेफर डेथ' का आंकड़ा सार्वजनिक किया जाए और लापरवाह डॉक्टरों पर सख्त कार्रवाई हो।
रेनू परिहार की मौत सिर्फ एक अस्पताल की विफलता नहीं, हमारी सामूहिक संवेदना की भी मौत है। हमने मान लिया है कि गरीब का जीवन सस्ता है। जब तक 'रेफर' की जगह 'रेस्क्यू' की संस्कृति नहीं आएगी और जब तक मंत्री और मजदूर का इलाज एक ही व्यवस्था में नहीं होगा, तब तक ऐसी दुखद खबरें अखबारों की सुर्खियों में छपती रहेंगी। सिस्टम बदलने के लिए केवल फाइलें नहीं, जनता को सवाल पूछने की जरूरत है।






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