भोपाल, 4 जून।
मध्यप्रदेश के गांवों और शहरों में दो बिल्कुल अलग तस्वीरें एक साथ दिखाई देती हैं। एक तरफ झुग्गी के बाहर खेलता 5 साल का बच्चा है, जिसकी पसलियां गिनी जा सकती हैं, वजन उम्र के हिसाब से आधा है और आंखें धंसी हुई हैं। दूसरी तरफ शहर के मॉल में पिज्जा-बर्गर खाती 30 साल की महिला है, जिसका वजन 90 किलो पार कर चुका है और डॉक्टर ने डायबिटीज की चेतावनी दे दी है। एक ही प्रदेश में एक ही समय में दो विपरीत महामारियां—कुपोषण और मोटापा—दिखाई दे रही हैं। नीति आयोग और नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की ताजा रिपोर्ट ने इस दोहरे संकट को उजागर कर दिया है।
रिपोर्ट का सबसे डरावना आंकड़ा यह है कि मध्यप्रदेश बच्चों में कम वजन के मामले में देश में तीसरे स्थान पर है। प्रदेश के 61.7 प्रतिशत बच्चे अंडरवेट हैं। पांच साल पहले यह आंकड़ा 52.3 प्रतिशत था, यानी हालात सुधरने के बजाय बिगड़े हैं। पांच साल से कम उम्र के 39.7 प्रतिशत बच्चे अंडरवेट यानी कुपोषित हैं। दस में से लगभग चार बच्चे ऐसे हैं, जिनका वजन उम्र के हिसाब से बेहद कम है।
यह सिर्फ आंकड़ा नहीं, आने वाले कल की बर्बादी है। कुपोषित बच्चा स्कूल में ध्यान नहीं लगा पाता, बार-बार बीमार पड़ता है और उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है। पांच साल की उम्र तक जो शारीरिक और मानसिक विकास होना चाहिए, वह कभी पूरा नहीं हो पाता। ये बच्चे बड़े होकर कमजोर मजदूर और बीमार किसान बनते हैं। गरीबी का दुष्चक्र पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता है। कारण साफ है—थाली में पोषण नहीं है। ग्रामीण इलाकों में मां को खुद खाने को नहीं मिलता, तो बच्चे को क्या खिलाएगी? आंगनबाड़ी में पोषण आहार कई बार भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। दाल, चावल और रोटी से पेट तो भर जाता है, पर प्रोटीन, विटामिन, आयरन और कैल्शियम कहां से आएंगे? दूध, अंडा, फल और हरी सब्जियां गरीब के घर में अक्सर त्योहारों पर ही दिखाई देती हैं।
अब दूसरी तस्वीर देखिए। शहरों में महिलाएं मोटापे की शिकार हो रही हैं। मध्यप्रदेश महिलाओं के मोटापे में देश में दूसरे स्थान पर पहुंच गया है। 2019-21 में 23 प्रतिशत महिलाएं ओवरवेट थीं, जबकि 2023-24 में यह आंकड़ा बढ़कर 26.5 प्रतिशत हो गया है। सिर्फ मोटापा ही नहीं, इसके साथ डायबिटीज भी बढ़ रही है। महिलाओं में हाई ब्लड शुगर के मामले 9.8 प्रतिशत से बढ़कर 14.5 प्रतिशत हो गए हैं। पुरुषों में भी यह आंकड़ा 15.4 प्रतिशत से बढ़कर 18.3 प्रतिशत पहुंच गया है। 30-35 साल की उम्र में ही लोग शुगर, ब्लड प्रेशर और थायरॉइड के मरीज बन रहे हैं।
इसका जवाब है अव्यवस्थित जीवनशैली और जंक फूड का बढ़ता प्रभाव। सुबह मैगी, दोपहर में पिज्जा और रात में बर्गर व कोल्ड ड्रिंक। घर का बना खाना अब बोरिंग लगने लगा है। फिजिकल एक्टिविटी लगभग शून्य है। ऑफिस में घंटों कुर्सी पर बैठना और घर आकर मोबाइल या टीवी में व्यस्त हो जाना आम बात हो गई है। महिलाएं घर के काम के बाद टीवी सीरियल में उलझ जाती हैं और वॉक करना भूल गई हैं। बच्चे मैदान छोड़कर मोबाइल गेम में व्यस्त हैं। नतीजा यह है कि पेट बाहर निकल रहा है और बीमारियां भीतर घर कर रही हैं।
यह विरोधाभास इसलिए पैदा हुआ है क्योंकि हमने पेट भरने को ही पोषण समझ लिया है। गरीब का बच्चा कैलोरी के लिए तरस रहा है, जबकि मध्यम वर्ग का बच्चा 'खाली कैलोरी' ठूंस रहा है। शहरों में 500 रुपए का पिज्जा आसानी से मिल जाता है, लेकिन 50 रुपए किलो दाल महंगी लगती है। टीवी पर जंक फूड के विज्ञापन दिन-रात चलते हैं, लेकिन पोषण की बात बहुत कम होती है। गांव में समस्या पहुंच की है, जहां आंगनबाड़ी तक पोषण आहार नहीं पहुंचता। शहर में समस्या चुनाव की है, जहां गलत खानपान को स्टेटस सिंबल बना दिया गया है।
पोषण अभियान, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना, आंगनबाड़ी सेवाएं और मिड-डे मील जैसी योजनाएं कागजों पर तो बहुत हैं, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। पोषण ट्रैकर ऐप में फोटो अपलोड हो जाती है, लेकिन कई बार लाभार्थियों तक अपेक्षित गुणवत्ता का भोजन नहीं पहुंच पाता। दूसरी तरफ जंक फूड पर प्रभावी नियंत्रण का अभाव है। स्कूलों के बाहर चिप्स, कुरकुरे और कोल्ड ड्रिंक की दुकानें सजी रहती हैं। एफएसएसएआई के नियम मौजूद हैं, लेकिन उनका प्रभाव सीमित दिखाई देता है।
कुपोषण से लड़ने के लिए आंगनबाड़ी और मिड-डे मील का सोशल ऑडिट होना चाहिए। स्थानीय महिलाओं को निगरानी में शामिल किया जाना चाहिए। पोषण आहार में अंडा, दूध और केला अनिवार्य किया जा सकता है। मोटापे पर नियंत्रण के लिए स्कूलों में जंक फूड पर प्रतिबंध, उनके आसपास अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों की बिक्री पर रोक और व्यापक जागरूकता अभियान जरूरी हैं। सही पोषण और स्वस्थ जीवनशैली को जनआंदोलन बनाना होगा। आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के माध्यम से घर-घर 'पोषण थाली' की जानकारी पहुंचाई जा सकती है। आधी थाली सब्जियां, चौथाई दाल या अन्य प्रोटीन और चौथाई अनाज का सिद्धांत अपनाना होगा।
हर गांव और शहर में पार्क, ओपन जिम और साइकिल ट्रैक जैसी सुविधाओं को बढ़ावा देना होगा। लोगों को नियमित व्यायाम और सक्रिय जीवनशैली के लिए प्रेरित करना होगा। मध्यप्रदेश आज दोहरी पोषण महामारी से जूझ रहा है। एक तरफ कुपोषण से बौनी पीढ़ी तैयार हो रही है, तो दूसरी तरफ मोटापा और शुगर से बीमार जवानी पनप रही है। याद रखिए, देश की ताकत सिर्फ हथियारों से नहीं, स्वस्थ नागरिकों से बनती है। अगर बच्चे कुपोषित होंगे तो भविष्य कमजोर होगा, और अगर युवा कम उम्र में ही गंभीर बीमारियों के शिकार हो जाएंगे तो विकास की गति भी प्रभावित होगी। सरकार, समाज और परिवार—सभी को मिलकर थाली का संतुलन लौटाना होगा। पोषण कोई लग्जरी नहीं, बल्कि मौलिक आवश्यकता है। यह अधिकार हर बच्चे, महिला और युवा को मिलना चाहिए। क्योंकि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ दिमाग बसता है और स्वस्थ दिमाग से ही स्वस्थ प्रदेश का निर्माण होता है।

















