नई दिल्ली, 4 जून ।
देश के वैज्ञानिकों ने हरित हाइड्रोजन उत्पादन की प्रक्रिया में प्रयुक्त उत्प्रेरक की संरचना में होने वाले बदलावों का महत्वपूर्ण खुलासा किया है, जिससे भविष्य में अधिक दक्ष, टिकाऊ और कम लागत वाली ऊर्जा प्रणालियों के विकास का मार्ग प्रशस्त होने की संभावना है।
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुसार बेंगलुरु स्थित सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज की टीम, जिसमें डॉ. नीना एस जॉन और शोधार्थी पलाश ज्योति गोगोई शामिल हैं, ने जर्मनी के किएल विश्वविद्यालय और बेंगलुरु के इंडो-कोरिया विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी केंद्र के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर यह अध्ययन किया है।
शोध में मोलिब्डेनम कार्बाइड नामक उत्प्रेरक के व्यवहार का गहन विश्लेषण किया गया, जिसमें पाया गया कि हाइड्रोजन उत्पादन की प्रक्रिया के दौरान इसकी संरचना स्थिर नहीं रहती बल्कि यह निरंतर गतिशील पुनर्निर्माण से गुजरती है, जो इसके प्रदर्शन को प्रभावित करती है।
इन-सीटू एक्स-रे अवशोषण स्पेक्ट्रोस्कोपी और इन-सीटू रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी जैसी उन्नत तकनीकों के माध्यम से किए गए अध्ययन में यह भी सामने आया कि प्रतिक्रिया के दौरान यह उत्प्रेरक ऑक्सीजन-रहित मोलिब्डेनम ऑक्साइड क्षेत्र बनाता है, जिससे हाइड्रोजन उत्पादन अधिक प्रभावी होता है और इसकी सक्रियता एवं स्थिरता बढ़ती है।
इसके विपरीत, मोलिब्डेनम या इसकी कार्बाइड संरचनाएं तेजी से ऑक्सीकरण होकर घुलनशील मोलिब्डेट प्रजातियों का निर्माण करती हैं, जिससे उत्प्रेरक की कार्यक्षमता कम हो जाती है। अध्ययन में यह भी स्पष्ट हुआ कि उत्प्रेरक की वास्तविक सक्रिय अवस्था प्रयोग के दौरान ही विकसित होती है, जिससे स्थानीय परमाणु संरचना, रेडॉक्स परिवर्तन और विद्युत-उत्प्रेरक प्रदर्शन के बीच गहरा संबंध स्थापित होता है।
यह शोध प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित हुआ है और इसमें कहा गया है कि उत्प्रेरक के गतिशील पुनर्निर्माण को समझकर मोलिब्डेनम कार्बाइड आधारित प्रणालियों की क्षमता को अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग किया जा सकता है, जिससे भविष्य में सस्ती और टिकाऊ हरित हाइड्रोजन उत्पादन तकनीकों का विकास संभव होगा।




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