भोपाल, 5 जून।
मध्यप्रदेश में मकानों की संख्या 1.49 करोड़ से बढ़कर 2.40 करोड़ हो गई है, पर लाखों आवास बंद मिले हैं। पलायन, बेरोजगारी और शहरीकरण की एक नई तस्वीर सामने आ रही है।
जनगणना सिर्फ लोगों की गिनती नहीं होती, बल्कि समाज की नब्ज टटोलने का सबसे बड़ा जरिया होती है। 2026 की जनगणना से पहले जारी हुए हाउस-लिस्टिंग के शुरुआती आंकड़े मध्यप्रदेश के लिए चौंकाने वाले हैं। 2011 में प्रदेश में 1.49 करोड़ मकान थे। 2026 तक इनके 2.40 करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है। यानी 15 साल में लगभग 90 लाख नए मकान बने। यह विकास का संकेत हो सकता है, लेकिन इसी डेटा का दूसरा पहलू चिंता बढ़ाता है। जबलपुर, इंदौर, भोपाल और छतरपुर जैसे शहरों में हजारों मकान बंद मिले। ताले लटके हैं, खिड़कियां बंद हैं और आंगन में सन्नाटा पसरा है। सवाल उठता है कि ये मकान खाली क्यों हैं और लोग कहां चले गए?
हाउस-लिस्टिंग का काम एक सप्ताह में पूरा हुआ। जनगणना अधिकारियों ने घर-घर जाकर मकानों की गणना की। मोटे तौर पर चार श्रेणियां बनाई गईं—रहने योग्य मकान, खाली मकान, बंद मकान और अन्य। 2011 की जनगणना में प्रदेश में 0.4 प्रतिशत मकान ‘बंद’ श्रेणी में थे। 2026 के शुरुआती आंकड़ों में यह अनुपात बढ़कर 0.8 प्रतिशत हो गया है। संख्या के हिसाब से देखें, तो लाखों मकान बंद पड़े हैं। जबलपुर में सबसे अधिक 4 हजार से ज्यादा घरों पर ताले मिले। दूसरे नंबर पर इंदौर, भोपाल और छतरपुर रहे, जहां 2500 से 3000 मकान बंद पाए गए। अधिकारियों का मानना है कि अंतिम आंकड़ों में यह संख्या और बढ़ सकती है। 15 साल में मकानों की संख्या 90 लाख बढ़ी, लेकिन बंद मकानों का अनुपात भी लगभग दोगुना हो गया।
इन तालों के पीछे कई कारण दिखाई देते हैं। पहला कारण पलायन है। बुंदेलखंड, बघेलखंड और महाकौशल के गांवों से बड़े पैमाने पर पलायन हुआ है। सूखा, बेरोजगारी और खेती में घटती आय के कारण परिवार इंदौर, सूरत, दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में रोजगार की तलाश में चले गए। गांवों में पुश्तैनी मकानों पर ताले लग गए। लोग त्योहारों पर लौटते हैं और फिर वापस चले जाते हैं। छतरपुर और टीकमगढ़ के कई गांवों की पहचान अब ‘बुजुर्गों के गांव’ के रूप में होने लगी है।
दूसरा कारण शहरीकरण का बदलता स्वरूप है। इंदौर और भोपाल जैसे शहरों में निवेश के उद्देश्य से मकान खरीदे गए। बिल्डरों ने फ्लैट बेच दिए, लेकिन खरीदार वहां रहने नहीं आए। वे अन्य शहरों में नौकरी करते हैं। ऐसे मकान निवेश या दूसरे घर के रूप में बंद पड़े हैं। जबलपुर में भी नर्मदा किनारे कई फ्लैट इसी स्थिति में हैं।
तीसरा कारण कोरोना काल के बाद ‘रिवर्स माइग्रेशन’ (वापसी पलायन) का असफल होना है। महामारी के दौरान गांव लौटे लोग फिर शहरों की ओर चले गए। मनरेगा और स्वरोजगार योजनाएं उन्हें स्थायी रूप से रोक नहीं सकीं। गांवों में स्कूल, अस्पताल और रोजगार के सीमित अवसर हैं, जबकि शहरों में झुग्गी में रहने के बावजूद आय का साधन उपलब्ध है। परिणामस्वरूप मकान बने, लेकिन उनमें जीवन नहीं बस पाया।
बंद मकान केवल ईंट और सीमेंट की संरचनाएं नहीं हैं, बल्कि सामाजिक बदलाव और चुनौतियों का संकेत भी हैं। गांवों में बंद घर अपराध और असामाजिक गतिविधियों का केंद्र बन सकते हैं। शहरों में खाली फ्लैट रखरखाव के अभाव में जर्जर हो रहे हैं। सबसे बड़ी चिंता सामाजिक ताने-बाने के कमजोर होने की है। मोहल्लों की रौनक घट रही है, त्योहारों की चहल-पहल कम हो रही है और बुजुर्ग अकेले पड़ते जा रहे हैं। 2011 में प्रदेश में 1.49 करोड़ आवास थे और अब 2.40 करोड़ हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या हमने घर बनाए हैं या केवल मकान?
ये आंकड़े नीति-निर्माताओं के लिए चेतावनी हैं। केवल मकान निर्माण को विकास का पैमाना नहीं माना जा सकता। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय अवसरों का विस्तार जरूरी है। यदि बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों में उद्योग नहीं होंगे, तो युवा पलायन करते रहेंगे। शहरों में किफायती किराये की व्यवस्था मजबूत नहीं होगी, तो आवासीय असंतुलन बना रहेगा। पंचायतों और ग्राम सभाओं की सक्रियता भी तब प्रभावित होती है, जब बड़ी आबादी गांव छोड़ देती है।
जनगणना 2026 डिजिटल स्वरूप में होगी और मोबाइल ऐप के माध्यम से रियल-टाइम डेटा उपलब्ध होगा। ऐसे में बंद मकानों का आंकड़ा विशेष महत्व रखेगा। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि कौन से क्षेत्र तेजी से खाली हो रहे हैं और किन शहरों में निवेश आधारित आवास अधिक हैं। इन आंकड़ों के आधार पर भविष्य की नीतियां तय होंगी।
90 लाख नए मकान बनना निश्चित रूप से उपलब्धि है, लेकिन बड़ी संख्या में मकानों पर ताले लगना चिंता का विषय भी है। यह आंकड़ा बताता है कि विकास केवल कंक्रीट का नहीं, बल्कि सामाजिक जुड़ाव और अवसरों का भी होना चाहिए। जब तक गांवों में अस्पताल, स्कूल और रोजगार उपलब्ध नहीं होंगे, तब तक पलायन का सिलसिला जारी रहेगा और ताले बढ़ते रहेंगे। जनगणना 2026 का यह शुरुआती डेटा एक आईना है। इसमें हमें यह देखना होगा कि हम केवल मकानों की संख्या बढ़ा रहे हैं या वास्तव में घरों को आबाद भी रख पा रहे हैं। क्योंकि मकान दीवारों से बनता है, लेकिन घर लोगों से बसता है। जब लोग ही अपने घर छोड़ दें, तो सबसे आलीशान मकान भी सूना और अधूरा लगता है।







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