काजल की कोठरी में उजला रहना वैसे ही मुश्किल काम है, लेकिन हमारे साहब ने इसे भी इवेंट बना .....
काजल की कोठरी में उजला रहना वैसे ही मुश्किल काम है, लेकिन हमारे साहब ने इसे भी इवेंट बना दिया है। मंत्रालय हो, गेस्ट हाउस हो या दौरा—हर जगह टिफिन एंट्री पहले और काम बाद में। बड़े गर्व से बताते हैं कि “घर का खाना” ही खाते हैं, मानो विभाग भी घर जैसा ही चला रहे हों। मितव्ययिता की मिसाल पेश करते-पेश करते विभाग में ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और जनता सेवा कहीं फाइलों के नीचे दब गई है। अब साथ बैठे लोग भी फुसफुसा रहे हैं—जितना दिखाया जा रहा है, उतना है नहीं, कुछ तो मामला गड़बड़ है।