प्रेरक कहानियाँ
25 Apr, 2026

जब सुदर्शन चक्र के भय से भागे दुर्वासा

राजा अम्बरीष की कथा उनके अद्भुत भक्ति, विनम्रता और श्रद्धा की महानता को दर्शाती है, जिसमें उन्होंने भगवान विष्णु की भक्ति से सुदर्शन चक्र की मदद से अपार संकट को दूर किया।

राजा अम्बरीष एक अत्यंत धर्मात्मा और प्रजापालक शासक थे। उनके राज्य में सुख-शांति का वास था। वे हमेशा धन, वैभव और लोभ से दूर रहते हुए अपना समय भगवान की भक्ति में व्यतीत करते थे। अपनी संपत्ति और राज्य को वे भगवान विष्णु की देन मानते थे और स्वयं को उनका दीन और निरंतर सेवक समझते थे। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उनकी रक्षा के लिए सुदर्शन चक्र को नियुक्त किया था।

एक दिन अम्बरीष ने एक वर्ष तक द्वादशी व्रत रखने का संकल्प लिया। व्रत के अंतिम दिन, उन्होंने विधिपूर्वक पूजा की, ब्राह्मणों को भोजन कराया और दान दिया। अब वे पारण करने ही वाले थे कि तभी महर्षि दुर्वासा वहां आ पहुंचे।

अम्बरीष ने उनका आदरपूर्वक स्वागत किया और भोजन के लिए निवेदन किया। दुर्वासा ने कहा, “मैं पहले स्नान करके आता हूं, फिर भोजन करूंगा।” यह कहकर वे नदी की ओर चले गए। लेकिन वे ध्यान में इतने लीन हो गए कि लौटने में अत्यधिक समय लग गया।

उधर द्वादशी का समय समाप्त होने को था। ब्राह्मणों के परामर्श से अम्बरीष ने केवल जल ग्रहण करके व्रत का पारण कर लिया, ताकि व्रत भी न टूटे और अतिथि का भी सम्मान बना रहे।

कुछ समय बाद, दुर्वासा स्नान से लौटे और देखा कि बिना उन्हें भोजन कराए अम्बरीष ने पारण कर लिया है। यह देखकर वह अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने अपनी जटा से एक बाल निकालकर कृत्या नामक राक्षसी उत्पन्न की, जो अम्बरीष को मारने के लिए दौड़ी।

तभी भगवान विष्णु का शक्तिशाली सुदर्शन चक्र प्रकट हुआ और उसने उस राक्षसी का वध कर दिया। फिर सुदर्शन चक्र दुर्वासा की ओर बढ़ने लगा।

सुदर्शन चक्र को अपनी ओर बढ़ते देख दुर्वासा भयभीत हो गए और अपनी जान बचाने के लिए भागने लगे। पहले वे ब्रह्मा के पास गए, फिर शिव के पास, लेकिन कहीं से भी उन्हें कोई मदद नहीं मिली। अंत में वे भगवान विष्णु के पास पहुंचे।

भगवान विष्णु ने उन्हें शांतिपूर्वक कहा, “मैं अपने भक्तों के अधीन हूं। तुमने मेरे भक्त का अपमान किया है, इसलिए तुम्हारी रक्षा केवल वही कर सकते हैं। तुम अम्बरीष के पास जाओ।”

दुर्वासा तुरंत अम्बरीष के पास लौटे। अम्बरीष अब भी उनकी प्रतीक्षा करते हुए बिना अन्न ग्रहण किए खड़े थे।

दुर्वासा ने विनम्रता से कहा, “राजन, कृपया मुझे इस चक्र से बचाइए।”

अम्बरीष ने हाथ जोड़कर भगवान विष्णु से प्रार्थना की, “प्रभु, मुनिवर को क्षमा करें।” उनका यह निवेदन करते ही सुदर्शन चक्र शांत हो गया और अंतर्धान हो गया।

सीख: इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची भक्ति में अहंकार और क्रोध नहीं होता। केवल क्षमा, विनम्रता और श्रद्धा से ही व्यक्ति महान बनता है।

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