कोलकाता, 25 अप्रैल।
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बीच केंद्र की प्रमुख नीति आयोग संरचना में बड़े बदलाव की तैयारी की जा रही है, जिसके तहत पूर्व आर्थिक सलाहकार अशोक लाहिड़ी को आयोग का नया उपाध्यक्ष बनाए जाने की संभावना है।
वे वर्तमान उपाध्यक्ष सुमन बेरी का स्थान संभाल सकते हैं, जिन्होंने बीते चार वर्षों से इस पद पर कार्य किया है और इस दौरान आयोग के कई नीतिगत कार्यों का नेतृत्व किया।
इसी क्रम में भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान, भोपाल के निदेशक गोबर्धन दास को नीति आयोग का सदस्य नियुक्त किए जाने की भी योजना है, जिससे आयोग की टीम में नया संतुलन देखा जा सकता है।
अशोक लाहिड़ी पश्चिम बंगाल के बालुरघाट से भारतीय जनता पार्टी के विधायक हैं, हालांकि उन्होंने आगामी वर्ष 2026 का विधानसभा चुनाव नहीं लड़ने का निर्णय लिया है।
वहीं गोबर्धन दास इससे पहले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक के रूप में कार्य कर चुके हैं और वर्ष 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पूर्वस्थली उत्तर सीट से भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी भी रहे थे।
इन दोनों संभावित नियुक्तियों को राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह बदलाव ऐसे समय में सामने आया है जब पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रक्रिया चल रही है और दूसरे चरण का मतदान निकट है।
गोबर्धन दास दलित समुदाय से संबंध रखते हैं और वर्ष 2021 के चुनाव के बाद राज्य में हुई हिंसा के दौरान उन पर हमले के आरोप भी सामने आए थे, जिससे उनकी नियुक्ति को सामाजिक और राजनीतिक दोनों दृष्टियों से अहम माना जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार यह पूरी प्रक्रिया नीति आयोग में लंबे समय से प्रस्तावित पुनर्गठन का हिस्सा है, जिसके तहत प्रशासनिक ढांचे को और अधिक सशक्त बनाने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं।
अशोक लाहिड़ी एक अनुभवी अर्थशास्त्री माने जाते हैं, जिन्होंने दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अध्यापन किया है तथा विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी वैश्विक संस्थाओं में भी कार्य किया है।
वे वित्त मंत्रालय से जुड़े रहे हैं और राष्ट्रीय लोक वित्त एवं नीति संस्थान का नेतृत्व कर चुके हैं, साथ ही मुख्य आर्थिक सलाहकार और 15वें वित्त आयोग के सदस्य भी रह चुके हैं।
लाहिड़ी को चुनावी आंकड़ों के विश्लेषण में भी विशेषज्ञ माना जाता है और उन्होंने ‘इंडिया डिसाइड्स’ नामक पुस्तक का सह-लेखन किया है, जिसमें कई दशकों के चुनावी रुझानों का अध्ययन शामिल है।











