कैंसर उपचार के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए रॉश फार्मा इंडिया ने गुरुवार को भारत में फेफड़ों के कैंसर के लिए इम्यूनोथेरेपी दवा टेसेंट्रिक (एटजोलिजुमैब) एससी को लॉन्च किया, जिसके तहत अब उपचार की प्रक्रिया घंटों की बजाय केवल सात मिनट में पूरी की जा सकेगी।
कंपनी के अनुसार यह पहली बार है जब इस दवा को त्वचा के नीचे देने की सुविधा उपलब्ध कराई गई है, जिससे पारंपरिक इंट्रावीनस इन्फ्यूजन की तुलना में उपचार का समय लगभग दो घंटे से घटकर सात मिनट रह गया है, हालांकि इसकी लागत काफी अधिक है क्योंकि एक वायल की अधिकतम खुदरा कीमत लगभग 3.7 लाख रुपये है और औसतन एक मरीज को लगभग छह साइकल की आवश्यकता हो सकती है।
रॉश फार्मा इंडिया ने बताया कि यह देश की पहली सबक्यूटेनियस लंग कैंसर इम्यूनोथेरेपी है, जो उपचार प्रक्रिया को लगभग 80 प्रतिशत तक तेज कर देती है और इससे मरीजों को अस्पताल में कम समय बिताना पड़ता है, साथ ही इलाज से जुड़े अप्रत्यक्ष खर्च और लंबी दूरी की यात्रा की आवश्यकता भी कम होती है।
कंपनी के सीईओ और एमडी राजविंदर (राज्जी) मेहदवान ने कहा कि रॉश का उद्देश्य ऐसे नवाचार लाना है जो केवल चिकित्सीय परिणामों को बेहतर न करें बल्कि मरीजों की सुविधा और उपचार से जुड़ी चुनौतियों को भी कम करें, और यह लॉन्च एडवांस्ड कैंसर केयर को अधिक सुलभ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
उन्होंने यह भी बताया कि इस तकनीक से एक ही समय में अधिक मरीजों का इलाज संभव होगा क्योंकि पारंपरिक इंट्रावीनस प्रक्रिया में जितने समय में एक मरीज का इलाज होता है, उतने समय में पांच मरीजों का उपचार किया जा सकता है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं का बेहतर उपयोग संभव होगा।
कंपनी ने जानकारी दी कि यह दवा दुनिया के 85 देशों में मान्यता प्राप्त कर चुकी है और अब तक 10,000 से अधिक मरीज इसका लाभ ले चुके हैं, साथ ही यह दुनिया की पहली और एकमात्र पीडी-एल1 इनहिबिटर दवा है जो इंट्रावीनस और सबक्यूटेनियस दोनों रूपों में उपलब्ध है और इसे पहले 2023 में एमएचआरए तथा 2024 में यूएसएफडीए की मंजूरी मिल चुकी है।
विशेषज्ञों के अनुसार भारत में इसे वर्तमान में एडजुवेंट और मेटास्टेटिक लंग कैंसर के उपचार के लिए मंजूरी प्राप्त है और क्लीनिकल अध्ययनों में इसे पारंपरिक आईवी थेरेपी जितना ही सुरक्षित और प्रभावी पाया गया है।
मेदांता अस्पताल के विशेषज्ञों ने इसे कैंसर उपचार में एक बड़ा बदलाव बताया, जबकि बेंगलुरु के विशेषज्ञों ने कहा कि इससे अस्पतालों पर दबाव कम होगा और इलाज अधिक तेजी से तथा कम जटिलता के साथ उपलब्ध हो सकेगा, जिससे मरीजों के अनुभव और जीवन गुणवत्ता में सुधार आएगा।








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