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गुजरात
14 May, 2026

स्टैच्यू ऑफ यूनिटी क्षेत्र के आदिवासी परिवारों में 665 बायोगैस संयंत्र स्थापित, ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर कदम

स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के आसपास आदिवासी परिवारों में 665 बायोगैस संयंत्र स्थापित किए जा चुके हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में ऊर्जा आत्मनिर्भरता और स्वच्छ ईंधन उपयोग को बढ़ावा मिल रहा है।

गुजरात, 14 मई।

गुजरात में स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के आसपास बसे आदिवासी परिवारों को ऊर्जा आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में सरकार की पहल के तहत बायोगैस संयंत्र लगाए जा रहे हैं। इस योजना के अंतर्गत करीब 1,000 आदिवासी परिवारों को शामिल किया गया है, जिनमें से 665 संयंत्रों की स्थापना पूरी हो चुकी है और परियोजना अंतिम चरण में पहुंच गई है।

यह योजना पिछले वर्ष एकता नगर में आयोजित राष्ट्रीय एकता दिवस परेड के दौरान प्रधानमंत्री द्वारा घोषित की गई थी, जिसमें स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के आसपास के क्षेत्रों में एक हजार आदिवासी परिवारों के घरों में बायोगैस संयंत्र लगाने की बात कही गई थी।

यह परियोजना नर्मदा जिले के गरुडेश्वर तालुका के 38 ग्राम पंचायतों के अंतर्गत आने वाले 89 गांवों में लागू की जा रही है और इसकी निगरानी जिला ग्रामीण विकास एजेंसी द्वारा की जा रही है।

अधिकारियों के अनुसार इस पहल का उद्देश्य घरेलू स्तर पर ऊर्जा आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना है, जिससे लोग रसोई गैस और लकड़ी पर निर्भरता कम कर सकें और जैविक कचरे का उपयोग ईंधन तथा कृषि कार्यों में कर सकें।

इस योजना के तहत संयंत्रों की स्थापना का पूरा खर्च सरकार द्वारा वहन किया जा रहा है, जबकि लाभार्थियों को केवल गड्ढे खोदने के लिए श्रम योगदान देना होता है।

इन संयंत्रों के उपयोग से ग्रामीण क्षेत्रों में रसोई के तरीकों और ईंधन के उपयोग में बदलाव देखा जा रहा है।

वाघपुरा गांव की निवासी रवीना तड़वी ने बताया कि पहले एलपीजी सिलेंडर की अनिश्चितता बनी रहती थी, लेकिन अब नियमित रूप से स्वच्छ ईंधन उपलब्ध हो रहा है। उन्होंने कहा कि बायोगैस संयंत्र से निकलने वाला घोल कृषि में रासायनिक खाद का बेहतर विकल्प बन रहा है और इससे फसल उत्पादन में भी वृद्धि हुई है।

एक अन्य ग्रामीण चंदू तड़वी ने कहा कि पहले महिलाओं को खेतों से लौटने के बाद लकड़ी इकट्ठा करने के लिए दूर जाना पड़ता था और पारंपरिक चूल्हों के धुएं से आंखों को नुकसान होता था, लेकिन अब बायोगैस के उपयोग से यह समस्या समाप्त हो गई है और वे स्वच्छ ऊर्जा के साथ आत्मनिर्भर बनी हैं।

अधिकारियों के अनुसार इन संयंत्रों से निकलने वाला घोल जैविक खाद के रूप में उपयोग किया जा रहा है, जिससे कृषि में रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम हो रही है।

665 से अधिक संयंत्रों की स्थापना पूरी हो चुकी है और शेष इकाइयों का कार्य भी निर्धारित गांवों में जारी है।

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