ओंकारेश्वर में आयोजित पांच दिवसीय “एकात्म पर्व” का मंगलवार को भव्य समापन हुआ, जिसमें संस्कृति एवं पर्यटन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) धर्मेंद्र भाव सिंह लोधी ने कहा कि क्षेत्र को अद्वैत दर्शन के विश्व स्तरीय केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। उन्होंने जानकारी दी कि करीब 2400 करोड़ रुपये की लागत से “अद्वैत लोक” का निर्माण कार्य प्रारंभ हो चुका है और इसे एकात्मकता के अंतरराष्ट्रीय केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में तेजी से कार्य जारी है।
समापन समारोह को संबोधित करते हुए मंत्री लोधी ने बताया कि यहां आचार्य शंकर की 108 फीट ऊंची ‘एकात्मता की मूर्ति’, शंकर संग्रहालय और अंतरराष्ट्रीय अद्वैत वेदांत संस्थान की स्थापना का कार्य भी गति पकड़ चुका है। साथ ही जनवरी से अप्रैल 2027 के बीच आदि शंकराचार्य के जन्म स्थान कालड़ी, केरल से केदारनाथ तक लगभग 17 हजार किलोमीटर लंबी “एकात्म यात्रा” निकाली जाएगी। ओंकार पर्वत पर 38 हेक्टेयर क्षेत्र में 40 हजार पौधों के रोपण के साथ “अद्वैत वन” का भी विकास किया जा रहा है।

उन्होंने आगे कहा कि अद्वैत लोक में डिजिटल लाइब्रेरी स्थापित की जाएगी, जहां आदि शंकराचार्य द्वारा रचित प्राचीन ग्रंथों की डिजिटल पांडुलिपियां उपलब्ध रहेंगी। इसके अलावा नर्मदा तट पर लेजर और साउंड शो शुरू किया जाएगा, जिसमें संध्या समय श्रद्धालुओं को आदिशंकराचार्य के जीवन और दर्शन की जानकारी दी जाएगी। ध्यान और साधना केंद्र के साथ ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों तथा चित्रकला, मूर्तिकला और संगीत आधारित कार्यशालाओं का भी आयोजन किया जाएगा।
मंत्री लोधी ने कहा कि ओंकारेश्वर आने वाले श्रद्धालु यहां से केवल स्मृति ही नहीं, बल्कि एकात्मकता का ज्ञान भी लेकर जाएंगे। उन्होंने कहा कि आदि शंकराचार्य के विचार आज भी समाज के लिए प्रासंगिक हैं और एकात्म पर्व का उद्देश्य इन शिक्षाओं को जन-जन तक पहुंचाना है।
कार्यक्रम में स्वामी अवधेशानंद गिरि ने अपने संबोधन में कहा कि “एकात्म धाम” और “अद्वैत लोक” जैसे प्रकल्प सराहनीय हैं। उन्होंने आह्वान किया कि शंकरदूत देश की सीमाओं से आगे बढ़कर विश्व स्तर पर आचार्य शंकर के संदेश का प्रसार करें। कार्यक्रम के अंत में उपस्थित लोगों को एकात्मता का संकल्प भी दिलाया गया।

वीडियो संदेश के माध्यम से जगद्गुरु श्रृंगेरी शंकराचार्य विधुशेखर भारती ने ऐसे प्रकल्पों की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि आदि शंकराचार्य ने चारों दिशाओं में पीठों की स्थापना कर देश को एक सूत्र में पिरोया था। वहीं स्वामी तेजोमयानंद सरस्वती ने कहा कि शंकराचार्य के अवतरण ने मानवता को अज्ञान के अंधकार से बाहर निकाला।
दक्षिणामूर्ति मठ वाराणसी के स्वामी पूर्णानंद गिरि ने अद्वैत वेदांत की परंपरा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वर्तमान समय में जब विश्व अशांति की ओर बढ़ रहा है, तब भी भारत में शांति और संतुलन का अनुभव होता है, जो महान संतों की विरासत का परिणाम है। स्वामिनी सद्विद्यानंद सरस्वती ने विभिन्न सत्रों का सार प्रस्तुत करते हुए अद्वैत परंपरा की समृद्धि और विभिन्न संप्रदायों के योगदान को रेखांकित किया। इस अवसर पर गुजरात के शिक्षाविद गौतम भाई पटेल और चिन्मय मिशन के स्वामी तेजोमयानंद सरस्वती को “शंकर अलंकरण” सम्मान प्रदान किया गया।

नर्मदा तट पर आयोजित दीक्षा समारोह में वैशाख शुक्ल पंचमी के अवसर पर देश-विदेश के 700 से अधिक युवाओं को ‘शंकरदूत’ के रूप में दीक्षित किया गया। यह दीक्षा कार्यक्रम स्वामी अवधेशानंद गिरि सहित अन्य संतों की उपस्थिति में संपन्न हुआ।
उल्लेखनीय है कि संस्कृति विभाग के आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास द्वारा मांधाता पर्वत स्थित “एकात्म धाम” में आयोजित यह पंच दिवसीय “एकात्म पर्व” मंगलवार को संपन्न हुआ। समापन समारोह में विभिन्न संत, विद्वान और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।





.jpg)



