मुंबई, 22 अप्रैल।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि कार्यस्थल पर किसी महिला सहकर्मी को घूरना नैतिक रूप से गलत आचरण है, लेकिन यह भारतीय दंड संहिता की धारा 354सी के तहत ‘वॉयरिज्म’ यानी जासूसी अपराध की श्रेणी में नहीं आता। अदालत ने कहा कि कानून की व्याख्या उसके स्पष्ट प्रावधानों से बाहर जाकर नहीं की जा सकती।
यह मामला वर्ष 2015 में मुंबई में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा था, जिसमें एक निजी बीमा कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी पर आरोप था कि वह बैठकों के दौरान महिला सहकर्मी से आंखें मिलाने के बजाय उसके शरीर के अंगों को घूरता था और अनुचित टिप्पणियां करता था। आंतरिक शिकायत समिति ने पहले ही उसे इस मामले में क्लीन चिट दे दी थी।
धारा 354सी के अनुसार वॉयरिज्म तब माना जाता है जब कोई व्यक्ति किसी महिला के निजी क्षणों में उसकी अनुमति के बिना तस्वीर या वीडियो बनाता है या उसे ऐसे हालात में देखता है, जहां उसकी निजता की अपेक्षा होती है, जैसे स्नान, निजी अंगों की स्थिति या यौन क्रिया।
अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि केवल कार्यालय बैठक के दौरान घूरने की शिकायत, चाहे उसे सही भी माना जाए, इस धारा के दायरे में नहीं आती। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वॉयरिज्म के लिए ‘निजी गतिविधि’ का होना अनिवार्य शर्त है, जो इस मामले में लागू नहीं होती।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर और सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द कर दिया और कहा कि इस मामले को आगे बढ़ाना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
अदालत ने यह भी माना कि ऐसा व्यवहार नैतिक रूप से अनुचित है, लेकिन हर अनुचित आचरण को उसी अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। हालांकि यह भी स्पष्ट किया गया कि ऐसे मामलों में धारा 354 या यौन उत्पीड़न से जुड़े प्रावधानों के तहत कार्रवाई संभव है, यह परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
सुप्रीम कोर्ट पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि जब कोई महिला निजी गतिविधि में शामिल न हो, तो उसकी तस्वीर या वीडियो बनाना वॉयरिज्म नहीं माना जाएगा।
यह कानून विशेष रूप से वर्ष 2012 के बाद महिलाओं की निजता की सुरक्षा के लिए लागू किया गया था, जिसमें पहली बार अपराध पर सजा का प्रावधान एक से तीन वर्ष और दोबारा अपराध पर तीन से सात वर्ष तक रखा गया है।
अदालत के इस फैसले ने यह स्पष्ट किया है कि कार्यस्थल पर अनुचित व्यवहार गंभीर विषय है, लेकिन हर अनैतिक आचरण को एक ही कानूनी धारा के तहत नहीं लाया जा सकता। ऐसे मामलों में आंतरिक शिकायत तंत्र और अन्य प्रासंगिक कानूनों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।






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