जयपुर, 22 अप्रैल।
राजस्थान उच्च न्यायालय ने आपराधिक मामलों में अपील से जुड़े अधिकारों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि पक्षकार की मृत्यु के बाद यदि दोषी के वारिस अपील जारी रख सकते हैं, तो पीड़ित के उत्तराधिकारियों को यह अधिकार न देना समानता के सिद्धांत के विपरीत और भेदभावपूर्ण स्थिति उत्पन्न करता है।
अदालत ने अपने अवलोकन में कहा कि इस असमानता को दूर करने के लिए विधिक प्रावधानों में संशोधन आवश्यक है और इस दिशा में विधायिका को गंभीरता से विचार करना चाहिए। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मृत्यु के बाद अपील जारी रखने के संबंध में दोनों पक्षों को समान अधिकार उपलब्ध होना चाहिए।
वर्तमान व्यवस्था के तहत पीड़ित की मृत्यु के बाद उसके कानूनी वारिसों को अपील जारी रखने का अधिकार प्राप्त नहीं है, जबकि दोषी पक्ष के वारिस इस प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकते हैं। अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 394 में संशोधन पर विचार करने का सुझाव देते हुए कहा कि पीड़ित पक्ष के परिवार को भी समान अधिकार दिया जाना चाहिए।
न्यायालय ने अपने आदेश की प्रति विधि आयोग को भी भेजी है और उनसे इस विषय पर अध्ययन कर विधायिका को आवश्यक संशोधन के लिए सुझाव देने को कहा है।
यह आदेश शिमला शर्मा की मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारियों द्वारा दायर आपराधिक याचिका की सुनवाई के दौरान दिया गया। मामले के अनुसार भूमि विवाद से जुड़े इस प्रकरण में शिकायतकर्ता की मृत्यु के बाद अपील जारी रखने को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ था, जिस पर अदालत ने विस्तृत टिप्पणी की।



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