नई दिल्ली, 21 अप्रैल
सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और उससे जुड़ी धार्मिक परंपराओं पर उच्चतम न्यायालय में सुनवाई जारी है, जहां इस मुद्दे ने एक बार फिर आस्था और संवैधानिक अधिकारों के बीच बहस को तेज कर दिया है। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने यह महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि केवल मूर्ति को स्पर्श करने से ईश्वर अपवित्र कैसे हो सकते हैं और ऐसी मान्यता का आधार क्या है।
न्यायालय ने यह भी पूछा कि क्या संविधान उस श्रद्धालु की रक्षा नहीं करेगा, जिसे केवल जन्म या वंश के आधार पर देवता के दर्शन और स्पर्श से वंचित किया जाता है। इस पर मंदिर पक्ष के वकील ने अपनी दलील में कहा कि धार्मिक स्थलों की परंपराएं उस धर्म की मूल पहचान होती हैं और पूजा की विधि देवता की प्रकृति के अनुसार निर्धारित की जाती है। उन्होंने भगवान अयप्पा को ब्रह्मचारी स्वरूप में मानते हुए कहा कि मंदिर की परंपराएं उसी आस्था के अनुरूप तय की गई हैं।
इस मामले की सुनवाई नौ न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ कर रही है, जिसमें अन्य धार्मिक विषयों को भी शामिल किया गया है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2018 में उच्चतम न्यायालय ने मासिक धर्म वाली महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को समाप्त किया था, जबकि वर्ष 1991 में केरल उच्च न्यायालय ने इस प्रकार की रोक को बरकरार रखा था। इसके बाद दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर अब अंतिम सुनवाई हो रही है।
सुनवाई के दौरान यह भी रेखांकित किया गया कि धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। वहीं मंदिर प्रशासन ने परंपराओं के पालन पर जोर देते हुए महिलाओं के प्रवेश का विरोध बनाए रखा है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अंतिम निर्णय संवैधानिक सिद्धांतों के आधार पर ही लिया जाएगा और इसके कल आने की संभावना जताई जा रही है।










