भोपाल, 16 मई।
भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा है कि डिजिटल परिवर्तन और पेपरलेस न्याय व्यवस्था भविष्य की न्याय प्रणाली के लिए अत्यंत आवश्यक और निर्णायक कदम है। उन्होंने कहा कि अब अदालतों की पहचान भारी-भरकम फाइलों से नहीं, बल्कि आधुनिक तकनीक और डिजिटल प्रणाली से होगी। वे जबलपुर में महाधिवक्ता कार्यालय द्वारा आयोजित “डिजिटल ट्रांसमिशन: एडवांसिंग पेपरलेस लीगल सिस्टम” विषय पर आयोजित विधिक व्याख्यान में संबोधित कर रहे थे।
मुख्य न्यायाधीश ने कोविड-19 महामारी को न्याय व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ बताते हुए कहा कि उस दौरान वर्चुअल सुनवाई और ई-फाइलिंग ने न्यायिक प्रक्रिया को नई दिशा दी। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने अब मिसलेनियस डेट्स पर पूरी तरह वर्चुअल हियरिंग का निर्णय लिया है, जिससे अधिवक्ताओं को घर बैठे बहस करने की सुविधा मिलेगी।
उन्होंने अपने शुरुआती करियर को याद करते हुए बताया कि मात्र 37 वर्ष की आयु में महाधिवक्ता बनने के दौरान उन्होंने स्व. अरुण जेटली के सहयोग से देश का पहला पूर्णतः कंप्यूटरीकृत महाधिवक्ता कार्यालय स्थापित कराया था। उन्होंने कहा कि आज लाइव स्ट्रीमिंग और नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के माध्यम से न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही और मजबूत हुई है।
डिजिटल समावेशन और पर्यावरण संरक्षण पर जोर देते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सिक्किम की तरह मध्यप्रदेश भी पेपरलेस व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जिससे पर्यावरण संरक्षण को बल मिलेगा। उन्होंने कहा कि तकनीक को बाधा नहीं बल्कि एक सेतु के रूप में देखा जाना चाहिए, ताकि ग्रामीण और वरिष्ठ नागरिक भी न्याय प्रणाली से जुड़ सकें।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश स्वर्णिम युग की ओर अग्रसर है। उन्होंने अयोध्या मामले के ऐतिहासिक निर्णय और शाहबानो प्रकरण का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे फैसलों से लोकतंत्र मजबूत होता है और यह समय न्याय व्यवस्था, लोकतंत्र तथा भारतीय मूल्यों के पुनर्जागरण का है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि मध्यप्रदेश न्याय और संस्कृति की समृद्ध परंपराओं वाला प्रदेश है, जो सम्राट विक्रमादित्य और राजा भोज की विरासत से जुड़ा है। उन्होंने पंचायत स्तर की “पंच परमेश्वर” परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि ग्रामीण समाज में सामूहिक न्याय की मजबूत परंपरा रही है।
उन्होंने ऐतिहासिक प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के शास्त्रार्थ जैसी घटनाएं भारतीय न्याय परंपरा की महानता को दर्शाती हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि नर्मदा की पवित्र धारा प्रदेश की संस्कृति, आध्यात्मिकता और शुचिता का प्रतीक है।
केंद्रीय राज्य मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने कार्यक्रम को न्यायपालिका, सरकार और तकनीक का उत्कृष्ट संगम बताया। उन्होंने कहा कि आज संसद और बजट व्यवस्था पूरी तरह पेपरलेस हो चुकी है और अब मोबाइल पर भी पूरी जानकारी उपलब्ध है, जो नई सोच और आधुनिकता का प्रतीक है।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा ने भी अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि पहले अदालतों में डिजिटल उपकरणों पर प्रतिबंध था, लेकिन अब तकनीक ने पूरी न्याय व्यवस्था को बदल दिया है और डिजिटल ट्रांसमिशन से मामलों के निपटारे में तेजी आई है।
कार्यक्रम में महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने विषय की उपयोगिता पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन, राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान के साथ हुआ। इस अवसर पर न्यायाधीश, मंत्री, सांसद, प्रशासनिक अधिकारी, पुलिस अधिकारी और बड़ी संख्या में अधिवक्ता उपस्थित रहे।









