नीट यूजी 2026 परीक्षा प्रश्नपत्र लीक के गंभीर आरोपों के चलते रद्द कर दी गई है, जिससे देशभर में छात्रों के भविष्य और परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।
13 मई।
देश की सबसे बड़ी चिकित्सा प्रवेश परीक्षा नीट यूजी 2026 आखिरकार रद्द कर दी गई। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी ने केंद्र सरकार की मंजूरी के बाद मंगलवार को इसकी घोषणा की। लाखों छात्रों और अभिभावकों के महीनों के दबाव, सामाजिक माध्यम पर वायरल प्रश्नपत्र और राजस्थान से मिले सबूतों के बाद यह फैसला टालना संभव नहीं रहा। अब परीक्षा की नई तारीखें जल्द जारी की जाएंगी, लेकिन सवाल यह है कि हर साल प्रश्नपत्र लीक की यह पटकथा क्यों दोहराई जा रही है और जिम्मेदार लोगों पर ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हो पा रही।
3 मई को आयोजित नीट यूजी 2026 परीक्षा देशभर के 4,000 से अधिक केंद्रों पर हुई। परीक्षा समाप्त होते ही सामाजिक माध्यम पर प्रश्नपत्र के पन्ने वायरल होने लगे। बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश से संदिग्ध गतिविधियों की शिकायतें सामने आईं। छात्रों ने आरोप लगाया कि कुछ परीक्षा केंद्रों पर समय से पहले उत्तर पुस्तिकाएं बदली गईं और चलभाष का इस्तेमाल हुआ।
राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी ने शुरुआत में इसे “स्थानीय गड़बड़ी” बताया, लेकिन जब राजस्थान से हस्तलिखित ‘अनुमानित प्रश्नपत्र’ बरामद हुए तो मामला गंभीर हो गया। जांच में पाया गया कि इन पन्नों में करीब 600 अंकों के सवाल असली परीक्षा से हू-ब-हू मेल खाते हैं। यह संयोग नहीं, बल्कि सुनियोजित लीक का संकेत था।
राजस्थान इस पूरे मामले की जांच का केंद्र बन गया। राजस्थान विशेष प्रचालन समूह ने खुफिया सूचना के आधार पर 10 मई को बड़ी कार्रवाई करते हुए देहरादून, सीकर और झुंझुनू से 13 संदिग्धों को हिरासत में लिया। इनमें सीकर के एक प्रतिष्ठित कोचिंग संस्थान से जुड़ा करियर परामर्शक भी शामिल है। प्रारंभिक जांच में पता चला कि एक संगठित गिरोह परीक्षा से 48 घंटे पहले प्रश्नपत्र लीक कर छात्रों को 15 से 30 लाख रुपए में बेच रहा था।
विशेष प्रचालन समूह के अधिकारियों के अनुसार, लीक का तंत्र राजस्थान से शुरू होकर उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और उत्तराखंड तक फैला हुआ है। व्हाट्सऐप समूहों और तार संदेश वाहिनी के जरिए उत्तर भेजे जाते थे। कुछ अभ्यर्थियों ने परीक्षा केंद्रों के भीतर स्मार्ट घड़ी और ब्लूटूथ यंत्र का भी इस्तेमाल किया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार ने जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को सौंप दी। अब एजेंसी यह पता लगाएगी कि प्रश्नपत्र राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी के मुद्रणालय से लीक हुआ, परिवहन के दौरान सेंध लगी या कोचिंग माफिया ने अंदर के लोगों को साध लिया। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो यह भी जांच करेगा कि क्या इस गिरोह को किसी राजनीतिक संरक्षण का लाभ मिल रहा था।
यह पहली बार नहीं है। वर्ष 2024 में भी नीट यूजी परीक्षा में कृपा अंक और प्रश्नपत्र लीक के आरोप लगे थे। सर्वोच्च न्यायालय ने तब दोबारा परीक्षा का आदेश नहीं दिया था, लेकिन राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की थी। इसके बावजूद तंत्र में सुधार नहीं हुआ और छात्रों का भरोसा लगातार टूटता गया।
नीट यूजी में हर साल 23 से 24 लाख छात्र शामिल होते हैं। इनमें से अधिकांश दो से तीन वर्षों तक तैयारी करते हैं। परीक्षा रद्द होने से उनका मनोबल टूट गया है। कई छात्रों का कहना है कि अब दोबारा तैयारी के लिए न समय बचा है और न ही आर्थिक संसाधन। दूसरी ओर, एक बड़ा वर्ग इस फैसले को सही मान रहा है। उनका कहना है कि यदि धांधली के बीच परीक्षा जारी रहती तो मेहनती छात्रों के साथ अन्याय होता। सामाजिक माध्यम पर “न्याय के लिए नीट” और “पुनः नीट 2026” जैसे अभियान चल रहे हैं। अभिभावकों का कहना है कि सरकार को परीक्षा की सुरक्षा पर जितना खर्च करना पड़े करे, लेकिन पारदर्शिता से समझौता नहीं होना चाहिए।
सरकार ने प्रश्नपत्र लीक रोकने के लिए कई कदम उठाए हैं। जैविक उपस्थिति, सीसीटीवी निगरानी, प्रश्नपत्रों का कूटलेखन और परीक्षा केंद्रों की यादृच्छिक व्यवस्था जैसी व्यवस्थाएं लागू की गईं। वर्ष 2023 में ‘सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम’ भी लाया गया, जिसमें 10 साल तक की सजा और एक करोड़ रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान है। इसके बावजूद लीक की घटनाएं नहीं रुक रही हैं।
इसके कारण भी स्पष्ट हैं। पहला, परीक्षा उद्योग हजारों करोड़ रुपए का हो चुका है। कोचिंग संस्थान, डमी अभ्यर्थी, स्कैनर-मुद्रक माफिया और अंदरूनी कर्मचारी मिलकर एक समानांतर अर्थव्यवस्था चला रहे हैं। दूसरा, जांच एजेंसियों की कार्रवाई अक्सर छोटे दलालों तक सीमित रह जाती है। मुख्य अपराधी और उनके राजनीतिक संरक्षणकर्ताओं तक हाथ नहीं पहुंच पाता। तीसरा, राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी जैसी संस्थाओं पर काम का अत्यधिक दबाव है। एक ही महीने में जेईई, नीट और सीयूईटी जैसी परीक्षाएं आयोजित करना मानवीय चूक की संभावना बढ़ा देता है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि हर बार गिरोह पकड़े जाते हैं, लेकिन सरगना बच निकलते हैं। राजस्थान विशेष प्रचालन समूह ने स्वीकार किया है कि कुछ संदिग्धों के तार स्थानीय नेताओं और कोचिंग संचालकों से जुड़े हैं। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के सूत्रों का कहना है कि धन का लेन-देन हवाला और कूटमुद्रा के जरिए हुआ, जिससे जांच और जटिल हो गई है।
जब तक राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं होगी, तब तक कानून केवल कागजों तक सीमित रहेगा। छात्रों का आरोप है कि चुनावी वर्षों में कोचिंग माफिया को खुली छूट मिल जाती है क्योंकि वे मोटा चंदा देते हैं। यदि यह आरोप सच है तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर और खतरनाक संकेत है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अब पारंपरिक परीक्षा प्रणाली पर भरोसा करना कठिन होता जा रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रश्नपत्र निर्माण, शृंखला अभिलेख आधारित उत्तर पुस्तिका अन्वेषण और यादृच्छिक बहु-पाली परीक्षा जैसे उपाय अपनाने होंगे। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी को मुद्रण और परिवहन का काम निजी एजेंसियों को देने के बजाय सरकारी निगरानी में लाना होगा। साथ ही कोचिंग संस्थानों का पंजीकरण और लेखापरीक्षा अनिवार्य की जानी चाहिए। जो संस्थान गैर-कानूनी तरीके से छात्रों को “गारंटी पैकेज” बेचते हैं, उन पर तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए। छात्रों को भी यह समझना होगा कि शॉर्टकट का रास्ता अंततः उनके करियर को ही बर्बाद करता है।
नीट केवल एक परीक्षा नहीं है, बल्कि लाखों परिवारों का सपना है। जब वही परीक्षा संदेह के घेरे में आ जाती है तो पूरा समाज निराश होता है। सरकार का दायित्व केवल परीक्षा रद्द करना नहीं, बल्कि दोषियों को ऐसी सजा दिलाना भी है कि अगली बार कोई भी व्यक्ति तंत्र से खिलवाड़ करने से पहले सौ बार सोचे। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी ने कहा है कि नई तारीखें जल्द घोषित की जाएंगी और छात्रों से अफवाहों पर ध्यान न देने की अपील की गई है, लेकिन केवल तारीख बदलने से समस्या हल नहीं होगी। समस्या तब सुलझेगी जब तंत्र में पारदर्शिता आएगी और जिम्मेदार लोगों पर कठोर कार्रवाई होगी।
नीट यूजी 2026 का रद्द होना केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि उस बीमारी का लक्षण है जो शिक्षा व्यवस्था को भीतर से खोखला कर रही है। प्रश्नपत्र लीक कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि एक संगठित अपराध है। यदि सरकार वास्तव में छात्रों के भविष्य को लेकर गंभीर है तो उसे दो काम करने होंगे। पहला, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की जांच को समयबद्ध कर दोषियों को सजा दिलानी होगी। दूसरा, परीक्षा प्रणाली को तकनीकी रूप से इतना मजबूत बनाना होगा कि प्रश्नपत्र लीक होना लगभग असंभव हो जाए।
अन्यथा हर साल लाखों छात्र सड़कों पर उतरेंगे, सामाजिक माध्यम पर न्याय की मांग करेंगे और सरकारें केवल “जांच जारी है” कहकर मामला ठंडा करती रहेंगी। छात्रों का भविष्य कोई प्रयोगशाला नहीं है, जहां बार-बार परीक्षण किया जाए। यह उनका जीवन है और उस जीवन से खिलवाड़ करने वालों को किसी भी स्थिति में बख्शा नहीं जाना चाहिए।