संपादकीय
27 Apr, 2026

संवैधानिक मर्यादा बनाम राजनीतिक सक्रियता

संवैधानिक पदों पर बैठे नेताओं की राजनीतिक सक्रियता और विरोध-प्रदर्शन में भागीदारी को लेकर उठ रहे प्रश्नों के बीच मर्यादा और जिम्मेदारी पर गंभीर बहस तेज हो गई है।

27 अप्रैल।

राजनीतिक दलों के बीच विचारधारा और नीतियों पर विरोध-प्रदर्शन मजबूत लोकतंत्र का संकेत है। दलीय व्यवस्था संविधान की बुनियाद है। राजनीतिक दलों से ही सरकार बनती है, लेकिन दल और सरकार एक नहीं हो सकते।
सरकार में संविधान की शपथ लेने के साथ ही दलीय भूमिका खत्म नहीं होती, लेकिन संविधान के अनुपालन की शर्त संवैधानिक पदों के साथ जुड़ जाती है। प्रधानमंत्री केंद्र में और मुख्यमंत्री राज्य में सबसे बड़ा संवैधानिक पद होता है। प्रश्न यह खड़ा होता है कि क्या राज्य का मुख्यमंत्री किसी विरोध-प्रदर्शन में शामिल हो सकता है।
लोकसभा में महिला आरक्षण बिल गिरने के बाद भाजपा इसके लिए विपक्षी दलों को जिम्मेदार बताते हुए विभिन्न राज्यों में विरोध-प्रदर्शन कर रही है। इन प्रदर्शनों में मुख्यमंत्री और संविधान की शपथ लेने वाले अन्य मंत्री भी शामिल हो रहे हैं। अब तक सामान्यतः संविधान की शपथ लेने वाले किसी भी विरोध-प्रदर्शन में शामिल नहीं होते थे। यह राजनीतिक दल का कार्य माना जाता है। संवैधानिक पद की शपथ लेने के बाद नेता सरकार का हिस्सा हो जाता है। सरकार राज्य के सभी नागरिकों की होती है। विरोधी दल के नेता और मतदाता भी राज्य के नागरिक हैं। उनके लिए भी कार्य करना सरकार का संवैधानिक दायित्व है।
मुख्यमंत्री और मंत्री जब संविधान की शपथ लेते हैं तो उनके शपथ का मूल यही होता है कि वे अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से निर्वहन करेंगे। भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना सभी के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करेंगे। यदि मुख्यमंत्री किसी भी मुद्दे पर एक पक्ष में विरोध-प्रदर्शन के लिए उतरेंगे, तो यह प्रश्न उठेगा कि बिना पक्षपात के न्याय कैसे संभव होगा।
जब मुख्यमंत्री ही एक पक्ष में विरोध-प्रदर्शन और आंदोलन में शामिल हो जाता है, तो उसका आचरण उस मुद्दे पर दूसरे पक्ष के विरुद्ध माना जाएगा। संवैधानिक पद पर शपथ लेने वाले मुख्यमंत्री और मंत्री लोकसेवक होते हैं। लोकसेवक के रूप में उनके दायित्व होते हैं। शासकीय कर्मचारी और अधिकारी भी लोकसेवक की श्रेणी में आते हैं।
सिविल सेवा आचरण नियम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि कोई भी शासकीय कर्मचारी अपनी सेवा से संबंधित किसी भी मामले में हड़ताल, प्रदर्शन या किसी भी प्रकार के विरोध में भाग नहीं ले सकता। राज्य सरकारों के आचरण नियम भी इसी के अनुरूप हैं, जो प्रदर्शनों को अनुशासनहीनता मानते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में स्पष्ट किया है कि सरकारी कर्मचारियों के पास हड़ताल करने का कोई मौलिक, कानूनी या नैतिक अधिकार नहीं है।
महिला आरक्षण विधेयक लोकसभा में गिरने के बाद भाजपा राजनीतिक अभियान चला रही है। इस अभियान में कोई बुराई नहीं है। कोई भी राजनीतिक दल ऐसा कर सकता है, लेकिन जिन राज्यों में उसकी सरकारें हैं, वहां संविधान की शपथ लेकर बैठे मुख्यमंत्री और मंत्री सामान्य रूप से ऐसा नहीं कर सकते। पहले भी मुख्यमंत्री विरोध-प्रदर्शनों में शामिल होते रहे हैं। मध्य प्रदेश में भी ऐसा हो चुका है।
तेलंगाना के मुख्यमंत्री जब जंतर-मंतर पर धरने पर बैठे थे, तब भाजपा की ओर से यही रुख लिया गया था कि मुख्यमंत्री धरना-प्रदर्शन में शामिल नहीं हो सकते।
मध्य प्रदेश में धरना-प्रदर्शन से जुड़े एक कानूनी मामले में संवैधानिक पद की मर्यादा का प्रश्न पहले भी उठ चुका है। भाजपा की उमा भारती जब मुख्यमंत्री बनीं, उससे पहले उन पर कर्नाटक के हुबली में राष्ट्रीय ध्वज फहराने के मामले में एक प्रकरण अदालत में लंबित था। जब वह मुख्यमंत्री बनीं, तब उस मामले में कोर्ट से गैर-जमानती वारंट जारी हुआ। प्रश्न यह उठा कि क्या उमा भारती मुख्यमंत्री रहते हुए अदालत में पेश होकर अपनी विधिसम्मत प्रक्रिया पूरी कर सकती हैं।
भाजपा के तत्कालीन शीर्ष नेतृत्व और विधि विशेषज्ञों ने माना कि वे ऐसा नहीं कर सकतीं। यदि वे अदालत में जाती हैं, तो उन्हें पद छोड़कर जाना चाहिए। उमा भारती ने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दिया और बाबूलाल गौर मुख्यमंत्री बने। उमा भारती बिना संविधान की शपथ लिए अपने कानूनी मामले में पेश हुईं। यदि कोई व्यक्ति मुख्यमंत्री रहते हुए अपने व्यक्तिगत कानूनी मामले में सक्रिय भूमिका नहीं निभा सकता, तो वह किसी धरना-प्रदर्शन में कैसे शामिल हो सकता है।
संविधान वही है, लेकिन समय के साथ व्यवस्था, कार्य-संस्कृति और प्रक्रियाओं में बदलाव आया है। राज्यों में सरकारी कार्यप्रणाली सामूहिकता से अधिक मुख्यमंत्री-केंद्रित हो गई है। राजनीतिक दल भी मुख्यमंत्री के अनुसार ही संचालित होते हैं। सारा फोकस और प्रबंधन मुख्यमंत्री पर ही निर्भर करता है। मुख्यमंत्री, मंत्री या सरकार की भागीदारी के बिना सत्ताधारी दल की गतिविधियां प्रभावी ढंग से पूरी नहीं हो पातीं।
महिला आरक्षण के मामले में लोकसभा में बिल गिरने पर विपक्षी दलों के खिलाफ निंदा प्रस्ताव को लेकर विधानसभाओं की बैठकें आयोजित की जा रही हैं। संसदीय विशेषाधिकार के अंतर्गत सदन के भीतर किसी भी सांसद के आचरण पर अदालत में प्रश्न नहीं उठाया जा सकता। लोकसभा के भीतर महिला आरक्षण का विरोध करने वाले सांसदों को अपने आचरण का विशेषाधिकार प्राप्त है। उनके आचरण की निंदा के लिए संसदीय प्रक्रिया का ही सहारा लिया जा रहा है। ऐसे में विधानसभा में लोकसभा के सांसदों के आचरण पर निंदा प्रस्ताव क्या संवैधानिक प्रक्रिया पर ही प्रश्न नहीं खड़ा करेगा।
संविधान की रक्षा को लेकर सभी राजनीतिक दल अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हैं। कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी अपनी सभाओं में संविधान की पुस्तक लहराते हैं। संविधान द्वारा स्थापित विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन शुद्ध अंतःकरण से ही किया जा सकता है।
शुद्ध अंतःकरण को मापने का कोई सार्वजनिक पैमाना नहीं है। हर व्यक्ति अपने अंतःकरण के लिए स्वयं जवाबदेह है। राजनीति में शामिल हर व्यक्ति यदि अपने अंतःकरण से संविधान की रक्षा करना चाहता है, तो निश्चित ही हमारा संविधान सुरक्षित रहेगा।
|
आज का राशिफल

इस सप्ताह आपके लिए अनुकूल समय है। पेशेवर मोर्चे पर सफलता मिलने के योग हैं। व्यक्तिगत जीवन में भी सुकून और संतोष रहेगा।
भाग्यशाली रंग: लाल
भाग्यशाली अंक: 9
मंत्र: "ॐ हं राम रामाय नमः"

आज का मौसम

भोपाल

29° / 42°

SUNNY

ट्रेंडिंग न्यूज़