संपादकीय
27 Apr, 2026

राहुल की कोशिश हर बार क्यों होती है असफल, सफलता के हर प्रयास का क्यों होता है पतन

राजनीतिक विश्लेषण में कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के बीच बदलते संबंधों, रणनीतिक टकराव और भरोसे की कमी को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं, जिससे राष्ट्रीय और राज्य स्तर की राजनीति प्रभावित हो रही है।

27 अप्रैल।
राहुल गांधी क्षेत्रीय दलों के साथ दिखते जरूर हैं, लेकिन उनका सारा जतन उनके पतन का होता है। शायद इसीलिए क्षेत्रीय दलों और राहुल गांधी के बीच विश्वास का संकट बना हुआ है। केंद्रीय राजनीति में भले सब साथ दिखते हैं, लेकिन राज्य की राजनीति में एक-दूसरे के पतन का मार्ग प्रशस्त करते हैं। बंगाल में राहुल गांधी टीएमसी और ममता बनर्जी के खिलाफ कुशासन और तुष्टिकरण का आरोप लगा रहे हैं। बंगाल में बीजेपी को मौका देने के लिए ममता बनर्जी और उनके पोलराइजेशन को जिम्मेदार बता रहे हैं।
राहुल गांधी को केंद्रीय राजनीति में साथ रखना क्षेत्रीय दलों की मजबूरी है, लेकिन राज्य की राजनीति में हर दल उनसे दूरी रखना चाहता है। कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के बीच कॉमन फैक्टर मुस्लिम वोट बैंक है। सभी दलों का इस वोट बैंक पर काबिज होने का सतत प्रयास होता है। जो क्षेत्रीय दल राज्य के चुनाव में कांग्रेस के साथ सीट शेयरिंग करते हैं, उसके पीछे भी यही सोच होती है कि मुस्लिम मतों में विभाजन न हो। राहुल गांधी ऐसा मानते हैं कि बीजेपी का मुकाबला केवल कांग्रेस ही कर सकती है।
सबसे पहले इसी का विश्लेषण किया जाए तो भाजपा जहां भी लंबे समय से सत्ता में है, वहां पहले कभी कांग्रेस की ही सत्ता थी। राहुल गांधी बंगाल में मुस्लिम पोलराइजेशन के लिए ममता को जिम्मेदार बता रहे हैं, तो उन्हें इस बात का भी जवाब देना पड़ेगा कि असम में बीजेपी को मौका कांग्रेस ने क्यों दिया? क्या इसके लिए असम में कांग्रेस का मुस्लिम तुष्टिकरण जिम्मेदार नहीं है? तुष्टिकरण तो कांग्रेस का डीएनए है।
अभी जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकार है, वहां मुस्लिम अपीजमेंट उनकी सरकारों का पहला लक्ष्य है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री तो यहां तक कहते हैं कि मुसलमान कांग्रेस हैं और कांग्रेस मुसलमान है। मुस्लिम आरक्षण पर भी कांग्रेस का ऐसा ही नजरिया देखा जाता है। ओबीसी रिजर्वेशन में ज्यादा से ज्यादा मुस्लिम बिरादरियों को जोड़कर कांग्रेस इस वर्ग के लोगों को आरक्षण में शामिल करने की कोशिश करती है।
राहुल गांधी कांग्रेस के बड़े नेता हैं, लेकिन उनके बयान और रणनीति बीजेपी के फायदे में ज्यादा दिखाई पड़ते हैं। जहां बीजेपी और कांग्रेस का सीधा मुकाबला है, वहां कांग्रेस कमजोर ही साबित होती है। असम में भी दो बार से कांग्रेस चुनाव हार रही है। इस बार भी सारे सर्वेक्षण कांग्रेस के खिलाफ ही परिणाम बता रहे हैं।
केंद्र में साथ, राज्य में खिलाफ—यह कांग्रेस की रणनीति राजनीतिक नुकसान पहुंचा रही है। बिहार में कांग्रेस ने राजद के साथ समझौता तो किया, लेकिन माहौल ऐसा बना कि राजद का सफाया हो गया। बंगाल में निश्चित रूप से ममता बनर्जी भाजपा से लड़ रही हैं। कांग्रेस और वामपंथियों का वहां वजूद नहीं बचा है। कांग्रेस यही चाहती है कि अगर ममता सत्ता से बाहर हो जाती हैं, तभी उसे अपना पैर जमाने में आसानी होगी। राहुल गांधी बंगाल में बीजेपी की जीत पर एक तरीके से खुश ही होंगे। उन्होंने जिस तरह का अभियान ममता बनर्जी के खिलाफ चलाया है, उससे तो यही लगता है कि टीएमसी के पतन में वह कांग्रेस का भविष्य तलाश रहे हैं।
दिल्ली में भी कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी के साथ ऐसा ही किया था। मुस्लिम ही एकमात्र वोट बैंक के रूप में किसी भी पार्टी के साथ मजबूती से खड़ा होता है। आजादी के बाद लंबे समय तक वह कांग्रेस के साथ रहा, फिर कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों के साथ जुड़ता गया।
उत्तर-दक्षिण का पोलराइजेशन भी कांग्रेस का एजेंडा है। कांग्रेस स्वयं को दक्षिण में मजबूत मानती है। अब अगर राहुल गांधी यह कहते हैं कि देश में एक कांग्रेस की विचारधारा है और दूसरी बीजेपी और संघ की, तब वह बीजेपी पर वन नेशन, वन लैंग्वेज, वन रिलिजन की विचारधारा का आरोप लगाते हुए भी पोलराइजेशन को ही हवा दे रहे हैं। अगर राहुल गांधी यह कहना चाहते हैं कि भाजपा और संघ हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान की धारणा पर काम कर रहे हैं, तो वह दक्षिण में अपने पक्ष में लामबंदी की कोशिश कर रहे हैं।
क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस के बीच रिश्ते केवल सत्ता हासिल करने तक सीमित हैं। इसमें भरोसे की बिल्कुल कमी है। अगले साल यूपी में चुनाव होना है। पिछले लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव की सपा के साथ समझौते के कारण कांग्रेस और सपा दोनों को काफी लाभ हुआ। विधानसभा चुनाव में भी दोनों के साथ जाने की संभावना दिखाई पड़ती है। राहुल गांधी जो रणनीति बंगाल में अपना रहे हैं, ममता बनर्जी को हराने की कोशिश कर रहे हैं, वही विचार अखिलेश यादव पर भी लागू होता है।
ममता और अखिलेश के बीच राजनीतिक संबंध बहुत मधुर हैं। अगर ममता बनर्जी इस चुनाव में हारती हैं, तो राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के साथ क्षेत्रीय दलों के रिश्तों पर भी गंभीर असर पड़ने की संभावना है। अखिलेश यादव भी यूपी के चुनाव में राहुल गांधी और कांग्रेस से दूरी बना सकते हैं। अगर समाजवादी पार्टी अकेले चुनाव में उतरती है, तो यह निश्चित है कि उनके पीडीए वोट बैंक में खास असर नहीं पड़ेगा।
विधानसभा में कांग्रेस के पास अभी भी यूपी में केवल दो सीटें हैं। उसका कोई बड़ा स्टेक चुनाव में नहीं है। सारा दारोमदार अखिलेश यादव के चुनाव पर निर्भर करेगा। बिहार, बंगाल, महाराष्ट्र और दिल्ली में क्षेत्रीय दलों के साथ राहुल गांधी और कांग्रेस द्वारा जिस तरह का व्यवहार किया गया है, जिस नकारात्मकता के साथ वहां क्षेत्रीय पार्टियों को हराने में कांग्रेस ने भूमिका निभाई है, वह बात अखिलेश यादव को जरूर परेशान कर रही होगी।
राहुल गांधी क्षेत्रीय दलों का खेल बिगाड़ने में लगे हैं। उनका अपना खेल तो पहले से ही बिगड़ा हुआ है। उन्हें लगता है कि क्षेत्रीय दलों के हारने से उनका जनाधार मजबूत होगा। राहुल गांधी की रणनीति से कांग्रेस कहीं नहीं पहुंची, जबकि क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस से लड़ने में ही फायदा दिखाई देता है।
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