प्रेरक कहानियाँ
25 Apr, 2026

संत ने चोर को कहा कि तू चोरी कर लेकिन...फिर... क्या हुआ?

जब हम अपने अंदर की जागरूकता को समझते हैं, तो बाहरी बुराईयों और गलतियों को छोड़ना आसान हो जाता है।

नागार्जुन के पास एक चोर आया और उसने कहा, "तुम ही एक ऐसे व्यक्ति हो जो शायद मुझे बचा सको। मैं कई महात्माओं के पास गया, लेकिन मैं सचमुच एक चोर हूं। मैं एक बड़ा प्रसिद्ध चोर हूं और मेरी यह प्रसिद्धि है कि आज तक कोई मुझे पकड़ नहीं पाया। मेरी प्रसिद्धि इतनी बढ़ चुकी है कि जिनके घर मैंने चोरी नहीं की, वे भी यह कहते हैं कि चोर ने हमारे घर चोरी की। क्योंकि मैं हमेशा उन्हीं के घर चोरी करता हूं, जो सच में धनवान होते हैं। मैं किसी के भी घर नहीं जाता, सिर्फ सम्राटों और बड़े-बड़े लोगों के घरों पर ही नजर रखता हूं। कोई भी मुझे पकड़ नहीं पाया। लेकिन जब भी मैं महात्माओं से पूछता हूं, वे कहते हैं—"पहले चोरी छोड़ दो।"

चोर ने कहा, "यह तो मैं नहीं छोड़ सकता। अगर छोड़ सकता तो इनके पास क्यों आता? कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे मुझे चोरी छोड़ने की जरूरत न पड़े, और फिर भी मैं छूट जाऊं। मैंने कई बार कसमें खाईं, नियम बनाए, लेकिन हर बार टूट गए और मैं आत्मग्लानि से भर गया।"

नागार्जुन ने कहा, "तूने अब तक किसी सच्चे महात्मा का सत्संग नहीं किया है। चोरी से डरने की कोई जरूरत नहीं है। तू जी भर के चोरी कर।"

चोर चौंका और बोला, "क्या कहते हो? जी भर के चोरी करूं?"

नागार्जुन मुस्कुराए और बोले, "हां, जी भर कर। लेकिन एक बात याद रख—चोरी करते वक्त हमेशा होश बनाए रखना। यह याद रखना कि यह चीज़ तुम्हारी नहीं है। ताला खोलते वक्त, तिजोरी खोलते वक्त, हीरे उठाते वक्त—हर पल यह याद रखना कि यह किसी और का है। बस होश बनाए रखना।"

पंद्रह दिन बाद, चोर वापस आया और बोला, "तुमने मुझे बड़ी मुश्किल में डाल दिया। पहले मैं कसमें खाता था, लेकिन अब जब होश में रहता हूं, तो चोरी नहीं कर पाता। तिजोरी खुली रहती है, हीरे सामने होते हैं, लेकिन हाथ नहीं बढ़ता। और अगर हाथ बढ़ाता हूं, तो होश खो जाता है। अब मैं दोनों को साथ नहीं रख सकता।"

नागार्जुन ने कहा, "अब यह तेरी समझ है। होश बचाना है तो होश बचा, चोरी करनी है तो चोरी कर, लेकिन दोनों साथ नहीं चल सकते।"

चोर ने कहा, "दो बार मैं बिना चोरी किए लौट आया। और उन रातों में जो शांति और आनंद मिला, वह पहले कभी नहीं मिला। हाथ खाली थे, लेकिन भीतर कुछ नया जन्म ले रहा था। ऐसा संतोष और तृप्ति पहले कभी नहीं मिली। अगर हीरे भी ले आता, तो भी उतना सुख नहीं मिलता।"

नागार्जुन मुस्कुराए और कहा, "अब समझ ले, जब तू जागरूक होगा तो चोरी अपने आप छूट जाएगी। दोनों साथ नहीं चल सकते।"

शील और चरित्र बाहर की बातें हैं, ध्यान और समाधि भीतर की अवस्था है। जब भीतर जागरूकता आती है, तो सही आचरण अपने आप उसका अनुसरण करता है। जैसे छाया शरीर के पीछे चलती है, वैसे ही जागृति के पीछे सदाचार चलता है।

यदि मनुष्य सचेत हो जाए, तो बुराइयां अपने आप छूटने लगती हैं।

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