भारत दुर्गा मंदिर के पावन प्रांगण में जब शंखनाद हुआ, तो मंच से एक ऐसी पुकार उठी जिसने हर माँ-बाप के दिल को छू लिया। बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र शास्त्री ने भावुक होकर कहा, “माँ भारती को मजबूत करना है तो घर-घर में चार दीप जलाओ—दो दीप अपने आँगन के लिए, दो दीप राष्ट्र के नाम, और यदि हो सके तो एक दीपक राष्ट्रसेवा के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समर्पित कर दो।” उस घड़ी मंच पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और देशभर के संत-महात्मा बैठे थे। मंदिर की आरती के साथ ही राष्ट्र आराधना का संकल्प भी गूंज उठा।
माँ की गोद से राष्ट्र की गोद तक—शास्त्री जी का स्वर काँप रहा था, आँखें नम थीं। बोले, “जब बाढ़ आती है, भूकंप आता है, महामारी आती है, तब सबसे पहले खाकी निकर वाले भाई दौड़ते हैं। वे किसी के सगे नहीं होते, फिर भी हर घायल को कंधा देते हैं। ये संस्कार कहाँ से आते हैं? माँ की गोद से। इसलिए कहता हूँ, चार संतानें हों—एक माँ-बाप की लाठी बने, एक बहन की राखी बने, एक देश की ढाल बने और एक समाज का दीपक बने।”
यह केवल संख्या की बात नहीं, संकल्प की बात है। कथावाचक प्रदीप मिश्रा भी पहले कह चुके हैं कि जब तक देश में जनसंख्या का कानून नहीं बनता, तब तक सनातन परिवारों को आगे आना होगा—दो बच्चे परिवार के, दो बच्चे भारत माता के। संघ प्रमुख की चिंता—समाज जिंदा रहे। डॉ. मोहन भागवत ने 2024 में ही नागपुर में कहा था कि किसी भी समाज को जीवित रहने के लिए प्रजनन दर 2.1 से कम नहीं होनी चाहिए। यदि बेटे-बेटियों की संख्या घटेगी, तो गाँव सूने होंगे, त्योहार फीके पड़ेंगे, मंदिरों में घंटे बजाने वाला कोई नहीं बचेगा। इसलिए उन्होंने तीन बच्चों की बात कही थी। आज संत उस अपील को और भाव से आगे बढ़ा रहे हैं।
माँ भारती बुला रही है—क्या हम सुनेंगे? भारत माता केवल नक्शा नहीं, हम सबकी माँ है। और माँ जब कमजोर होती है, तो बच्चे का फर्ज बनता है कि वह उसे संभाले। आज भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है—140 करोड़ से ज्यादा भाई-बहन। पर क्या केवल संख्या से देश मजबूत होता है? नहीं, संख्या के साथ संस्कार चाहिए, संकल्प चाहिए, समर्पण चाहिए। सोचिए, यदि हर घर से एक बेटा या बेटी यह ठान ले कि उसे डॉक्टर बनकर गाँव में सेवा करनी है, शिक्षक बनकर बच्चों का भविष्य गढ़ना है, सैनिक बनकर सीमा बचानी है या स्वयंसेवक बनकर आपदा में काम आना है, तो भारत को विश्व गुरु बनने से कौन रोक सकता है?
मातृशक्ति का सम्मान—कोख से कौशल तक। भागवत जी ने कहा, दुनिया में कहीं पाकिस्तान माता या चीन माता नहीं कहते, केवल भारत में नारी को देवी कहते हैं। यह सच है, पर देवी का सम्मान तभी पूरा होगा जब हम उसकी कोख को बोझ न समझें, वरदान समझें। जब हम हर बेटी को पढ़ाएँ, हर माँ को अस्पताल दें, हर बहन को हुनर दें। चार बच्चों की बात का अर्थ यह नहीं कि माँ की सेहत दाँव पर लगा दी जाए; अर्थ यह है कि समाज मिलकर ऐसी व्यवस्था करे कि माँ भी स्वस्थ रहे और देश भी सशक्त बने। एक बच्चा यदि राष्ट्रसेवा में जाता है, तो पूरा गाँव, पूरा समाज उसके परिवार के साथ खड़ा हो—तभी ‘देवी’ शब्द सार्थक होगा।
विश्व गुरु का रास्ता—जननी से जगत तक। राम मंदिर पर कभी संदेह था, आज भव्य मंदिर खड़ा है। वैसे ही भारत के विश्व गुरु बनने पर कुछ लोग संदेह करते हैं, पर याद रखिए—गुरु बनने के लिए शिष्य चाहिए, और शिष्य जन्म से आते हैं। यदि आज हम जन्म से ही डर जाएँगे, तो कल पाठशाला कौन भरेगा, प्रयोगशाला कौन चलाएगा, सीमा पर कौन खड़ा होगा? चीन ने एक-बच्चा नीति अपनाई, आज वहाँ बूढ़े बढ़ गए, जवान घट गए। जापान में गाँव-के-गाँव खाली हो रहे हैं। भारत के पास अभी 25-30 साल का सुनहरा समय है। हमारी आधी आबादी जवान है। यदि हमने अभी कोख को कोसा, तो कल कोख हमें कोसेगी।
राष्ट्र निर्माण का मंत्र—जन्म भी, कर्म भी। संतों की अपील का मूल भाव यही है कि परिवार केवल अपना न सोचे, राष्ट्र का भी सोचे। एक बच्चा यदि सेना में जाता है, तो वह 140 करोड़ की नींद बचाता है। एक बच्चा यदि डॉक्टर बनता है, तो हजारों जिंदगियाँ बचाता है। एक बच्चा यदि शिक्षक बनता है, तो पूरी पीढ़ी संवार देता है। और एक बच्चा यदि स्वयंसेवक बनता है, तो आपदा में सबसे पहले पहुँचता है। यह अपील किसी पर थोपने के लिए नहीं, झकझोरने के लिए है, ताकि हम सोचें कि हमने भारत माता के लिए क्या किया। क्या हम केवल लेने वाले बनेंगे या देने वाले भी?
संतुलन और समाधान—शिक्षा सबसे बड़ी दवा। डर यह है कि एक वर्ग की आबादी घटे और दूसरे की बढ़े, तो संतुलन बिगड़े। पर इसका इलाज कोख रोकना नहीं, सोच बदलना है। केरल देखिए—वहाँ मुस्लिम परिवारों में भी औसतन दो से कम बच्चे हैं, कारण बेटियाँ 92 फीसदी पढ़ी-लिखी हैं। उत्तर प्रदेश में हिंदू परिवारों में भी चार-चार बच्चे हैं, क्योंकि बेटियों की पढ़ाई 61 फीसदी पर अटकी है। यानी मजहब नहीं, मजमून बदलिए। बेटी पढ़ेगी तो परिवार खुद समझ जाएगा कि दो बच्चे अच्छे। बेटी कमाएगी तो देश खुद मजबूत हो जाएगा।
अंतिम बात—आँसू नहीं, आशीष चाहिए। भाइयों-बहनों, चार बच्चों की बात सुनकर डरिए मत, समझिए—यह माँ भारती की पुकार है। वह कह रही है—मुझे संख्या नहीं, समर्पण चाहिए; मुझे भीड़ नहीं, भक्ति चाहिए। मुझे बोझ नहीं, बेटे चाहिए जो हल चलाएँ, हथियार उठाएँ, हॉस्पिटल चलाएँ और हौसला बढ़ाएँ। यदि हर माँ-बाप यह संकल्प कर ले कि मेरे घर का एक दीपक भारत माता के मंदिर में जलेगा, तो वह दिन दूर नहीं जब दुनिया कहेगी—“भारत सचमुच विश्व गुरु है।” कोख से क्रांति निकलती है, पर क्रांति को दिशा संस्कार देते हैं। इसलिए जन्म दो, पर साथ में ज्ञान दो; संख्या बढ़ाओ, पर साथ में सामर्थ्य बढ़ाओ। तभी भारतवर्ष अजेय होगा, अमर होगा।
माँ भारती का कर्ज चुकाना है, तो घर के आँगन से ही शुरुआत करनी होगी। एक दीपक आप जलाइए, एक दीपक राष्ट्र के नाम जलाइए। भारत माता की जय।