मध्य प्रदेश में “एक शाला एक परिसर” योजना के तहत हो रहे स्कूलों के विलय और बंदी को लेकर शिक्षा व्यवस्था, शिक्षकों की कमी और ग्रामीण बच्चों की पहुंच पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
16 मई।
मध्य प्रदेश में शिक्षा का चेहरा तेजी से बदल रहा है। सरकार “गुणवत्तापूर्ण शिक्षा” और “सर्वसुविधायुक्त स्कूल” का नारा देकर छोटे स्कूलों को बंद कर रही है। पिछले चार वर्षों में प्रदेश में करीब 7 हजार स्कूल बंद हो चुके हैं और अब “एक शाला एक परिसर” योजना के तहत कम विद्यार्थियों वाले स्कूलों के विलय की प्रक्रिया और तेज कर दी गई है। स्कूल शिक्षा विभाग ने जिला शिक्षा अधिकारियों से कम छात्र संख्या वाले स्कूलों की सूची मंगाकर संकेत दे दिया है कि आने वाले सत्र में सैकड़ों और स्कूलों पर ताले लग सकते हैं।
यह नीति एक ओर संसाधनों के बेहतर उपयोग का तर्क देती है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के बच्चों की शिक्षा तक पहुंच पर गंभीर सवाल खड़े करती है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि पिछले 15 वर्षों में प्रदेश में 49 हजार स्कूल बंद हो चुके हैं। केवल 2020-21 से 2024-25 के बीच 7 हजार स्कूल बंद किए गए। अब 1 से 5 किलोमीटर के दायरे में स्थित 20 से कम विद्यार्थियों वाले स्कूलों को चिन्हित कर बड़े स्कूलों में मर्ज किया जा रहा है।
सबसे अधिक असर उन जिलों पर पड़ा है जहां पहले से ही शिक्षा की स्थिति कमजोर है। छिंदवाड़ा में 1525, बैतूल में 1461, रीवा में 1438, सागर में 1423 और पन्ना में 1389 स्कूल बंद हुए हैं। बालाघाट, राजगढ़, विदिशा, सीधी और भिंड में भी एक हजार से अधिक स्कूल बंद किए गए हैं। इन जिलों में आदिवासी आबादी अधिक है, साक्षरता दर कम है और ड्रॉपआउट रेट पहले से ज्यादा है। ऐसे में स्कूल बंद होने से बच्चों का पढ़ाई छोड़ना लगभग तय माना जा रहा है।
सरकार का तर्क है कि छोटे स्कूलों में शिक्षक और संसाधनों की कमी होती है, इसलिए विलय जरूरी है। लेकिन हकीकत यह है कि प्रदेश में शिक्षकों की भारी कमी सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है। स्वीकृत 2,89,005 शिक्षक पदों में से 1,15,678 पद रिक्त हैं, यानी लगभग 40 प्रतिशत पद खाली हैं। 1,968 स्कूल ऐसे हैं जहां केवल एक शिक्षक है और 46,417 स्कूलों में मात्र दो शिक्षक पदस्थ हैं। जब बड़े स्कूलों में ही शिक्षकों की कमी है, तो मर्ज किए गए स्कूलों में गुणवत्ता कैसे सुधरेगी?
“स्मार्ट क्लास” और “डिजिटल लैब” का सपना तब तक अधूरा रहेगा, जब तक कक्षा में पढ़ाने वाला शिक्षक ही उपलब्ध नहीं होगा। अतिथि शिक्षकों के भरोसे व्यवस्था चल रही है, लेकिन वे न तो नियमित हैं और न ही पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित। ऐसे में विलय के बाद भी शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ने की कोई गारंटी नहीं दिखाई देती।
सरकार का दावा है कि “एक शाला एक परिसर” योजना से बच्चों को बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, विज्ञान प्रयोगशाला, पुस्तकालय और खेल मैदान जैसी सुविधाएं मिलेंगी। नए शैक्षणिक सत्र में 274 संदीपनि विद्यालयों में से 161 के भवन निर्माण कार्य पूरे हो चुके हैं। 97 स्कूल नए भवनों में शिफ्ट हो चुके हैं, जबकि 64 भवनों का लोकार्पण अभी बाकी है। लेकिन जिन स्कूलों को नए परिसरों में स्थानांतरित किया जा रहा है, उनके अधीन आने वाले 300 से अधिक प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल बंद किए जा रहे हैं। इसका सीधा असर बच्चों की पहुंच पर पड़ेगा।
ग्रामीण इलाकों में 3 से 5 किलोमीटर पैदल चलना कोई छोटी बात नहीं है। बारिश, सर्दी और जंगली जानवरों का खतरा अलग है। लड़कियों के लिए यह चुनौती और बड़ी हो जाती है। ऐसे में कई परिवार बच्चों को स्कूल भेजना ही बंद कर सकते हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 कहता है कि हर बच्चे को एक किलोमीटर के दायरे में प्राथमिक स्कूल उपलब्ध होना चाहिए, लेकिन जब स्कूल ही बंद हो जाएंगे तो यह प्रावधान केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा।
स्कूल केवल पढ़ाई की जगह नहीं होते, बल्कि गांव के सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्र भी होते हैं। यहां मिड-डे मील बनता है, टीकाकरण होता है, चुनाव कराए जाते हैं और सामुदायिक बैठकें आयोजित होती हैं। स्कूल बंद होने से यह पूरा तंत्र कमजोर पड़ता है। आर्थिक रूप से भी इसका असर पड़ता है। स्थानीय शिक्षकों, रसोइयों और कर्मचारियों की आजीविका प्रभावित होती है, जबकि बच्चों को दूर भेजने का अतिरिक्त बोझ गरीब परिवारों पर पड़ता है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूल बंद करने के बजाय उन्हें मजबूत करने की जरूरत है। खाली पदों को मिशन मोड में भरा जाए, नियमित शिक्षकों की नियुक्ति हो और हर स्कूल में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। जहां विलय आवश्यक हो, वहां बच्चों के लिए सुरक्षित और मुफ्त परिवहन की व्यवस्था भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को स्कूल से जोड़ना है, उनसे दूरी बनाना नहीं। यदि विलय के नाम पर ग्रामीण बच्चों को शिक्षा से वंचित किया गया, तो “गुणवत्तापूर्ण शिक्षा” का नारा खोखला साबित होगा। शिक्षा में बचत नहीं, निवेश की जरूरत है, क्योंकि स्कूल बंद होने का अर्थ केवल इमारतों का बंद होना नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी के भविष्य पर संकट खड़ा होना है।