भोपाल, 10 जून।
साफ लहरों वाला समंदर, हरियाली से ढके पहाड़ और निर्मल बहती नदियां... इन्हें देखकर किसका मन प्रसन्न नहीं होता? प्रकृति का यह सुंदर रूप हर किसी को आकर्षित करता है। सुबह की ताजी हवा, पक्षियों का कलरव, पहाड़ों की शांति और नदियों की कल-कल ध्वनि मन को सुकून देती है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस प्रकृति की सुंदरता पर हम मोहित होते हैं, उसकी रक्षा की जिम्मेदारी लेने से अक्सर पीछे हट जाते हैं। कचरा साफ करना तो दूर, अपना ही कचरा उसमें शामिल कर देते हैं और फिर भी एक स्वच्छ पर्यावरण की अपेक्षा रखते हैं। हम प्रकृति से बहुत कुछ लेते हैं, लेकिन उसे लौटाने की भावना कहीं पीछे छूटती जा रही है।
समंदर...
समंदर हमारे मन की गहराई से भी गहरा है। उसके भीतर कितना कुछ समाया है, इसका अंदाजा लगाना आसान नहीं। फिर भी वह अपनी लहरों के सहारे बहुत कुछ किनारों तक पहुंचा देता है। मानो वह अपने भीतर कुछ भी सहेजकर नहीं रखता। लेकिन हम उसकी विशालता और उदारता को समझने के बजाय उसे प्रदूषण का बोझ दे रहे हैं। प्लास्टिक, रासायनिक कचरा और अन्य अपशिष्ट पदार्थ लगातार समुद्री जीवन के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। जो समंदर हमें जीवन, सुंदरता और संतुलन देता है, हम उसी को गंदगी लौटाते हैं। समुद्री जीवों का अस्तित्व भी इसी कारण संकट में पड़ रहा है। यदि समय रहते हमने अपनी आदतें नहीं बदलीं, तो आने वाली पीढ़ियां स्वच्छ समुद्र देखने के लिए तरस सकती हैं।
पहाड़...
पहाड़ों को देखकर हमेशा लगता है कि मजबूती को शोर मचाने की आवश्यकता नहीं होती। वे हर मौसम को सहते हैं, फिर भी अडिग खड़े रहते हैं। उनकी हरियाली, उनकी शांति और उनका धैर्य प्रकृति की अमूल्य धरोहर हैं। पहाड़ हमें सिखाते हैं कि परिस्थितियां कैसी भी हों, अपने मूल्यों और संतुलन को नहीं छोड़ना चाहिए। दुर्भाग्य से विकास की दौड़ में हम उनके अस्तित्व को भी लगातार चोट पहुंचा रहे हैं। अंधाधुंध निर्माण, पेड़ों की कटाई और खनन गतिविधियों ने पर्वतीय क्षेत्रों के प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित किया है। इसका परिणाम भूस्खलन, जल संकट और जैव विविधता के नुकसान के रूप में सामने आ रहा है। पहाड़ केवल पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि जलवायु संतुलन और जल स्रोतों के संरक्षक भी हैं।
नदियां...
नदियां जब स्वच्छ और निर्मल बहती हैं तो केवल जल नहीं बहता, जीवन बहता है। खेतों की हरियाली, जीव-जंतुओं का अस्तित्व और हमारी अनेक आवश्यकताएं नदियों पर निर्भर हैं। नदी हमें निरंतर आगे बढ़ते रहने का संदेश देती है। लेकिन आज हम उन्हीं नदियों में कचरा और प्रदूषण बहाकर उनके अस्तित्व को संकट में डाल रहे हैं। कई नदियां औद्योगिक अपशिष्ट, सीवेज और प्लास्टिक प्रदूषण से जूझ रही हैं। नदियों का संरक्षण केवल पर्यावरणीय विषय नहीं, बल्कि मानव जीवन और भविष्य की सुरक्षा का प्रश्न भी है। यदि नदियां स्वस्थ रहेंगी, तभी समाज और अर्थव्यवस्था भी स्वस्थ रह पाएंगे।
हमारी जिम्मेदारी
काश! हम यह समझ पाते कि पर्यावरण की रक्षा किसी एक व्यक्ति, संस्था या सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। इसकी शुरुआत हमसे होती है। अक्सर हम सोचते हैं कि हमारे अकेले के प्रयास से क्या होगा, लेकिन हर बड़ा परिवर्तन एक छोटे कदम से ही शुरू होता है।
हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा।
खुद अकेले इस राह पर चलकर तो देखिए, कारवां अपने आप बनता जाएगा। यदि हम अपने घर, अपने मोहल्ले और अपने आसपास की स्वच्छता की जिम्मेदारी लेने लगें, तो उसका प्रभाव दूर तक दिखाई देगा। एक पौधा लगाना, प्लास्टिक का कम उपयोग करना, जल को व्यर्थ न बहाना, बिजली की बचत करना और कचरे को सही स्थान पर डालना, ये छोटे कदम ही बड़े बदलाव की नींव बनते हैं। पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है, इसके लिए जनभागीदारी सबसे महत्वपूर्ण है।
पर्यावरण केवल प्रकृति नहीं, हमारा वर्तमान और भविष्य दोनों है। समंदर, पहाड़, नदियां और हरियाली हमारी धरोहर हैं। इन्हें बचाना किसी और पर उपकार नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी है। यदि हम अपने प्रयासों से पर्यावरण की रक्षा में थोड़ा भी योगदान दे पाए, तो यही एक जागरूक और अच्छे नागरिक होने का सबसे बड़ा प्रमाण होगा।
प्रकृति हमें जीवन देती है, अब उसे सुरक्षित रखना हमारा कर्तव्य है। यही कर्तव्यबोध आने वाले समय में स्वच्छ, सुरक्षित और संतुलित पर्यावरण की सबसे मजबूत नींव साबित होगा।
-डॉ. गार्गी पाण्डे










