भोपाल, 24 जून।
मध्यप्रदेश में उच्च स्तरीय समिति द्वारा तैयार समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के ड्राफ्ट पर शहर काजी और विधायक आरिफ मसूद के नेतृत्व वाले मुस्लिम पक्ष ने आपत्ति जताई है। उनका तर्क है कि धार्मिक भावनाओं से छेड़छाड़ स्वीकार नहीं होगी। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी जैसे विपक्षी दलों ने लिव-इन संबंधों से जुड़े प्रावधानों पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इससे सामाजिक संरचना प्रभावित हो सकती है। यह बहस तीन महत्वपूर्ण बिंदुओं को सामने लाती है - सामाजिक न्याय, संवैधानिक मर्यादा और जनस्वीकृति।
संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य को सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता बनाने का निर्देश दिया गया है। गोवा में पहले से समान सिविल कोड लागू है और उत्तराखंड ने भी हाल ही में यूसीसी लागू किया है। इसलिए मध्यप्रदेश का प्रयास संवैधानिक दायरे में है। समिति ने ड्राफ्ट तैयार करते समय धर्मगुरुओं, नागरिकों और राजनीतिक दलों से सुझाव लिए हैं। इससे स्पष्ट है कि सरकार संवाद और परामर्श के माध्यम से आगे बढ़ने का प्रयास कर रही है।
मुस्लिम पक्ष की आपत्ति का आधार धार्मिक प्रथाओं और पहचान की सुरक्षा है। इस्लामिक पर्सनल लॉ में विवाह, तलाक, मेहर और उत्तराधिकार जैसे विषय धार्मिक मान्यताओं से जुड़े हैं। दूसरी ओर, राज्य का तर्क समानता पर आधारित है। यदि कानून धर्म के आधार पर अलग-अलग बने रहेंगे, तो संविधान के अनुच्छेद 14 में वर्णित समानता का सिद्धांत कमजोर पड़ सकता है। इसलिए आवश्यकता टकराव की नहीं, बल्कि अनुच्छेद 25 द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता और अनुच्छेद 44 के उद्देश्य के बीच संतुलन स्थापित करने की है।
लिव-इन संबंधों के पंजीकरण को लेकर भी बहस जारी है। समर्थकों का तर्क है कि इससे महिलाओं को कानूनी सुरक्षा मिलेगी, जबकि विरोधियों का मानना है कि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक मान्यताओं से टकरा सकता है। ऐसे मुद्दों का निर्णय भावनाओं के बजाय तथ्यों और सामाजिक अध्ययनों के आधार पर होना चाहिए।
यूसीसी पर चल रही बहस लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। कानून तभी सफल होगा, जब समाज उसे स्वीकार करेगा। इसलिए आवश्यक है कि सभी पक्षों को विश्वास में लेकर ऐसा संतुलित मॉडल तैयार किया जाए, जो धार्मिक संवेदनशीलता का सम्मान करते हुए संवैधानिक समानता के लक्ष्य को भी पूरा कर सके।










