नई दिल्ली, 24 जून।
भारत को आजाद हुए दशकों बीत गए, लेकिन देश के कई हिस्सों में इंसान आज भी कर्ज और मजबूरी की जंजीरों में जकड़ा हुआ है। सरकार ने बंधुआ मजदूरी उन्मूलन अधिनियम, 1976 बनाया, संविधान के अनुच्छेद 23 के तहत बेगार और जबरन श्रम पर प्रतिबंध लगाया, विजिलेंस कमेटियां गठित कीं और पुनर्वास योजनाएं शुरू कीं। इसके बावजूद बंधुआ मजदूरी पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी है। कड़े निर्देश और कानून मौजूद हैं, लेकिन उनका प्रभाव जमीन पर सीमित दिखाई देता है।
बंधुआ मजदूरी की सबसे बड़ी वजह गरीबी और कर्ज का जाल है। किसान, खेतिहर मजदूर और आदिवासी क्षेत्रों के लोग छोटी-छोटी जरूरतों के लिए साहूकारों से उधार लेते हैं। ब्याज इतना अधिक होता है कि मूलधन कभी खत्म नहीं होता। कर्ज चुकाने के बदले मजदूरी शुरू होती है और यह सिलसिला वर्षों तक चलता रहता है। कई बार एक पीढ़ी का कर्ज दूसरी पीढ़ी तक पहुंच जाता है। कानून इसे अपराध मानता है, लेकिन ग्रामीण समाज में इसे मजबूरी समझकर स्वीकार कर लिया जाता है।
ईंट भट्टों, पत्थर खदानों, चावल मिलों और अन्य असंगठित क्षेत्रों में बंधुआ मजदूरी अक्सर छिपकर संचालित होती है। मजदूरों को उनके अधिकारों की जानकारी नहीं होती। कई मामलों में उन्हें बाहर जाने, नौकरी छोड़ने या स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने की छूट तक नहीं मिलती। शिकायत करने का तंत्र मौजूद है, लेकिन जानकारी के अभाव में उसका उपयोग नहीं हो पाता। जिला स्तर की निगरानी समितियां भी कई बार अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखातीं।
बंधुआ मजदूरी की पहचान करना भी आसान नहीं है। कानून के अनुसार यदि कोई व्यक्ति कर्ज या दबाव के कारण काम छोड़ने के लिए स्वतंत्र नहीं है, तो वह बंधुआ मजदूर माना जाएगा। लेकिन व्यवहार में अधिकारियों द्वारा दस्तावेज, गवाह और प्रमाण मांगे जाते हैं। दूसरी ओर, शोषण करने वाले लोग लिखित रिकॉर्ड नहीं रखते। परिणामस्वरूप पीड़ित व्यक्ति अपने ही शोषण को साबित करने में असफल रहता है। कई मामलों में पुलिस और संबंधित विभागों की उदासीनता भी समस्या को और गंभीर बना देती है।
पुनर्वास व्यवस्था भी कमजोर कड़ी साबित हुई है। मुक्ति के बाद आर्थिक सहायता, कौशल प्रशिक्षण और वैकल्पिक रोजगार का प्रावधान है, लेकिन इन योजनाओं का लाभ समय पर नहीं मिल पाता। आजीविका के विकल्प न होने के कारण कई मुक्त मजदूर दोबारा उसी व्यवस्था में लौट जाते हैं जिससे उन्हें बाहर निकाला गया था। यह स्थिति बताती है कि केवल मुक्ति नहीं, बल्कि स्थायी पुनर्वास भी उतना ही आवश्यक है।
इस समस्या का समाधान नियमित निगरानी, त्वरित कार्रवाई और व्यापक जागरूकता में है। पंचायत स्तर तक अभियान चलाए जाएं, श्रमिकों को उनके अधिकार बताए जाएं और शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई हो। साथ ही, सुलभ ऋण व्यवस्था और रोजगार के अवसर बढ़ाकर साहूकारों पर निर्भरता कम की जाए।
बंधुआ मजदूरी केवल कानूनी नहीं, बल्कि मानवीय और सामाजिक चुनौती है। एक स्वतंत्र देश में किसी भी व्यक्ति का श्रम और जीवन बंधन में नहीं होना चाहिए। कागज पर लिखे निर्देश तभी सार्थक होंगे, जब उनका प्रभाव धरातल पर दिखाई देगा। असली सफलता तब होगी, जब हर मजदूर भय, कर्ज और शोषण से मुक्त होकर सम्मानपूर्वक जीवन जी सकेगा।










