मध्य प्रदेश
24 Jun, 2026

कोहबर और माते पूजा चित्र परंपरा पर तीन दिवसीय शिविर का समापन

भोपाल में आयोजित तीन दिवसीय अंकन शिविर में उत्तरप्रदेश की कोहबर और माते पूजा चित्र परंपराओं की सांस्कृतिक विशेषताओं, प्रतीकों और संरक्षण के महत्व पर विस्तार से जानकारी दी गई।

भोपाल, 24 जून।

मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में उत्तरप्रदेश की पारंपरिक कोहबर चित्रकला और माते पूजा चित्र परंपरा पर आधारित तीन दिवसीय अंकन शिविर का समापन बुधवार को हुआ। लोक कला और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के उद्देश्य से आयोजित इस शिविर में कलाकारों और कला प्रेमियों को उत्तरप्रदेश की लोक चित्र परंपराओं से परिचित कराया गया।

22 से 24 जून तक आयोजित यह शिविर मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय और उत्तरप्रदेश लोक एवं जनजाति संस्कृति संस्थान, लखनऊ के संयुक्त सहयोग से संपन्न हुआ। कार्यक्रम का उद्देश्य लोक चित्रकला की पारंपरिक विधाओं का संरक्षण, संवर्धन और प्रलेखन करना रहा।

शिविर में गोरखपुर की कलाकार कुमुद सिंह ने कोहबर कला की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए बताया कि पूर्वांचल क्षेत्र की इस चित्र परंपरा में विभिन्न प्रतीकों के माध्यम से सांस्कृतिक और मंगल भावनाओं की अभिव्यक्ति की जाती है। इसमें बांस को वंशवृद्धि, समृद्धि और सामाजिक निरंतरता का प्रतीक माना जाता है।

अयोध्या की कलाकार दीपा सिंह ने बताया कि कोहबर चित्रकला का विशेष महत्व विवाह और अन्य मांगलिक अवसरों पर होता है। इसमें गेरू, हल्दी, चावल का घोल, चूना, सिंदूर और काजल जैसे प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है। चित्रों में देवी-देवताओं, पक्षियों, वनस्पतियों और समृद्धि से जुड़े प्रतीकों का अंकन किया जाता है।

शिविर में थारू जनजाति की कोहबर कला की परंपरा पर भी चर्चा हुई। इस कला में हाथी, धान, वृक्ष, मछली और कमल जैसे प्रतीकों का प्रयोग किया जाता है, जिन्हें शुभता, जीवन, शक्ति और पारिवारिक कल्याण का प्रतीक माना जाता है।

मथुरा की कलाकार सीमा मोरवाल ने माते पूजा चित्र परंपरा के महत्व से परिचित कराया। उन्होंने बताया कि ब्रज क्षेत्र में विवाह संस्कारों के दौरान महिलाएं घरों की दीवारों और वस्त्रों पर प्राकृतिक रंगों से चित्रांकन करती हैं। इस कला में उर्वरता, सौभाग्य और मंगल जीवन की कामना से जुड़े प्रतीकों को स्थान दिया जाता है।

माते पूजा चित्रों में सोलह गुड़ियां, हाथ के थापे, गाय, पीपल, स्वास्तिक, सूर्य, चंद्रमा और मोर जैसे प्रतीकों का अंकन किया जाता है। ये चित्र लोक जीवन, प्रकृति और सांस्कृतिक आस्था का जीवंत स्वरूप प्रस्तुत करते हैं।

तीन दिवसीय इस शिविर के माध्यम से पारंपरिक लोक कलाओं के संरक्षण और नई पीढ़ी को उनसे जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की गई।

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