भोपाल, 30 जून।
मध्य प्रदेश की सियासत में इस समय सबसे बड़ा सवाल यही गूंज रहा है कि आखिर दलाल कौन है? कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी दिल्ली में प्रेसवार्ता कर मोहन यादव सरकार पर ताबड़तोड़ हमला बोलते हैं और आरोप लगाते हैं कि उज्जैन में वीर भारत न्यास को एक रुपये में 500 करोड़ रुपये की जमीन दे दी गई। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री के सलाहकार श्रीराम तिवारी ट्रस्ट में हैं और यह खुला घोटाला है। लेकिन अगले ही दिन उज्जैन में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह उसी सरकार को क्लीन चिट देते हुए कहते हैं कि ट्रस्ट निजी नहीं, बल्कि सरकारी है, इसलिए जमीन देना गलत नहीं है।
एक ही पार्टी के दो बड़े चेहरे आमने-सामने हैं। एक सरकार को चोर बता रहा है, दूसरा उसी सरकार को साधु बता रहा है। जनता पूछ रही है कि भरोसा किस पर करे—पटवारी पर या दिग्विजय पर, कांग्रेस पर या भाजपा पर? दिग्विजय सिंह ने दस्तावेज दिखाते हुए कहा कि जब कांग्रेस की सरकार थी, तब कमलनाथ स्वयं इस ट्रस्ट के अध्यक्ष थे। अब सवाल यह है कि यह सफाई है या पटवारी के आरोपों पर सवाल? उन्होंने आगे कहा कि देश में दलालों की कमी नहीं है, जो झूठे आरोप लगाकर पैसा वसूलते हैं। यह बयान सीधे पटवारी के आरोपों की धार को कमजोर करता है।
अब सवाल उठता है कि दलाल कौन है? पटवारी, जो आरोप लगा रहे हैं, या वे लोग, जिनकी ओर दिग्विजय सिंह बिना नाम लिए इशारा कर रहे हैं? भाजपा को कुछ कहने की जरूरत ही नहीं पड़ रही, क्योंकि कांग्रेस खुद अपने नेताओं के बयानों से घिरी हुई है। मोहन यादव सरकार पर हमला करने से पहले कांग्रेस को अपने घर में झांकना चाहिए। पटवारी कहते हैं कि जमीन घोटाला हुआ है, जबकि दिग्विजय कहते हैं कि सब नियमों के तहत हुआ है। ऐसे में कार्यकर्ता किसकी बात माने?
असल में यह लड़ाई जमीन की नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति की नजर आती है। जीतू पटवारी नए प्रदेश अध्यक्ष हैं और सरकार को आक्रामक ढंग से घेरना चाहते हैं। दूसरी ओर दिग्विजय सिंह अनुभवी नेता हैं। उनके बयान ने भाजपा को राहत दी और पटवारी के अभियान की धार कम कर दी।
वीर भारत न्यास की जमीन का सच क्या है, यह तो पूरी फाइल सामने आने पर ही स्पष्ट होगा। लेकिन कांग्रेस ने इस मुद्दे को खुद ही उलझा दिया है। यदि पटवारी के पास ठोस सबूत हैं तो उन्हें अपने आरोपों पर कायम रहना चाहिए। वहीं यदि दिग्विजय सिंह के पास ऐसे दस्तावेज हैं, जो अध्यक्ष के पास नहीं हैं, तो उन्हें पहले पार्टी मंच पर रखना चाहिए। मीडिया में परस्पर विरोधी बयान केवल भ्रम पैदा करते हैं और सत्ता पक्ष को राजनीतिक लाभ पहुंचाते हैं।
सरकार को भी चाहिए कि वह पूरी फाइल सार्वजनिक करे और बताए कि जमीन किस नियम के तहत, किस उद्देश्य से दी गई तथा ट्रस्ट में कौन-कौन शामिल है। इससे जनता स्वयं तय कर सकेगी कि मामला घोटाले का है या केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का। कांग्रेस नेतृत्व को भी अब स्पष्ट निर्णय लेना होगा, क्योंकि घर की लड़ाई लंबी चली तो बाहर की लड़ाई जीतना और कठिन हो जाएगा।











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